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Presidential Elections 2022: 70 सालों में पहली बार कांग्रेस ने राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर क्यों नहीं दिखाई खास दिलचस्पी? यह है वजह

सार

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला को बताया कि यह कहना गलत है कि पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार तय करने में अपनी भूमिका नहीं निभाई, या वह ईडी के दबाव में फंसकर अपनी जिम्मेदारी भूल गई। दरअसल, राष्ट्रपति उम्मीदवार के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के सक्रिय होने से पहले ही इस मुद्दे पर शरद पवार, एमके स्टालिन और वामदलों से बातचीत शुरू हो चुकी थी...
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कांग्रेस पार्टी - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
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देश की आजादी से लेकर अब तक हुए सभी राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस प्रमुख खिलाड़ी रही है। बड़ी राजनीतिक ताकत रहने पर उसने अपने उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा और जिताया तो कुछ कमजोर होने पर गठबंधन दल के नेताओं से बातचीत कर एक साझा उम्मीदवार खड़ा किया और चुनाव में अपनी भूमिका अदा की। लेकिन संभवतया यह पहली बार है जब कांग्रेस ने इस बार राष्ट्रपति उम्मीदवार तय करने में अगुवाई नहीं की है। उसकी बजाय तृणमूल कांग्रेस जैसे छोटे दलों ने सक्रियता दिखाई और यशवंत सिन्हा को विपक्ष के एक साझा उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया। कांग्रेस उन्हें समर्थन दे रही है। कांग्रेस ने इस चुनाव में स्वयं को 'बैकसीट' पर रखने की रणनीति क्यों अपनाई? क्या पार्टी प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जारी पूछताछ में इतनी ज्यादा फंस गई कि उसने खुद को पीछे हटा लिया?

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कांग्रेस ने एक बेहद महत्वपूर्ण मौके पर यह रुख तब अपनाया है जब वह खुद को मजबूत करने की हर संभव कोशिश करने की बात कहते हुए देखी जाती है। उदयपुर चिंतन शिविर में भी पार्टी को दोबारा मजबूत भूमिका में लाने के लिए जमीनी संघर्ष करने और लोगों से जुड़ने की बात कही गई थी। पार्टी नेताओं खासकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को तमाम अहम सवालों पर संघर्ष करते हुए देखकर लगता भी है कि वे अपने मकसद को लेकर गंभीर हैं। तब ऐसे महत्त्वपूर्ण अवसर पर पार्टी ने बैकसीट पर बैठना क्यों स्वीकार किया।

सोनिया को उम्मीदवार घोषित किया जाता तो?

राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय का मानना है कि वर्तमान गणित देखकर राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की उम्मीवार द्रौपदी मुर्मू की जीत तय है, लेकिन इसके बाद भी यदि कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित किया होता, या विपक्ष के साझा राष्ट्रपति उम्मीदवार तय करने में प्रमुख भूमिका निभाई होती, तो इसके बहाने वह लगातार चर्चा में रहती। इस समय पार्टी के लिए लगातार सक्रिय बने रहना और मीडिया में चर्चा में बने रहना भी जरूरी है।

यदि सहयोगी दलों को विश्वास में लेकर सोनिया गांधी को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किया जाता, तो इसके बहाने मीडिया में खूब चर्चा होती। विपक्ष के किसी अन्य ज्यादा चर्चित व्यक्ति को उम्मीदवार बनाकर भी मुकाबले को कुछ रोचक बनाया जा सकता था। विपक्ष में मजबूती से आवाज उठाते रहने से मतदाताओं में पार्टी के लगातार सक्रिय रहने का संदेश दिया जा सकता था। चूंकि विपक्षी दल भी जानते हैं कि यह लड़ाई प्रतीकात्मक मात्र रह गई है, लिहाजा उनके पास कांग्रेस के इस दावे को नकारने का कोई ठोस कारण न होता और वे सहमत भी हो जाते, लेकिन पार्टी ने यह अवसर गंवा दिया। हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि सोनिया गांधी इस दौड़ में आकर अपनी फजीहत नहीं करवा सकती हैं जब जीत की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही हो।

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संभवतया कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस जैसे छोटे दलों की सक्रियता के सामने 'आत्मसमर्पण' कर दिया। उसके लिए यह स्वयं मुख्य विपक्षी दल की भूमिका से पीछे हटने पर अपनी सहमति देने जैसा है। पार्टी के भविष्य को लेकर यह बहुत सकारात्मक संदेश नहीं कहा जा सकता। पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे इसका नुकसान हो सकता है।

सहयोगी दलों से हो चुकी थी बात

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला को बताया कि यह कहना गलत है कि पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार तय करने में अपनी भूमिका नहीं निभाई, या वह ईडी के दबाव में फंसकर अपनी जिम्मेदारी भूल गई। दरअसल, राष्ट्रपति उम्मीदवार के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के सक्रिय होने से पहले ही इस मुद्दे पर शरद पवार, एमके स्टालिन और वामदलों से बातचीत शुरू हो चुकी थी। पार्टी विपक्षी दलों के बीच एक सर्वमान्य नाम पर आम सहमति बनाने की रणनीति पर काम कर रही थी। लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने जिस तरह आक्रामकता के साथ साझा उम्मीदवार तय करने में सक्रियता दिखाना शुरू किया और उसमें भी सीधे शरद पवार को ही उम्मीदवार बनाने की मुहिम शुरू कर दी, उसके बाद पार्टी ने बैकसीट ले लिया।

कांग्रेस सांसदों-विधायकों की संख्या भी इतनी निर्णायक नहीं है कि वह अकेले दम पर बड़ा निर्णय ले सके। लिहाजा परिस्थितियों को देखकर पार्टी ने अन्य विपक्षी दलों के द्वारा तय किए गए उम्मीदवार को अपना समर्थन देने की रणनीति अपनाई। ममता बनर्जी द्वारा कांस्टिट्यूशन क्लब में उम्मीदवार तय करने के लिए बुलाई गई बैठक में अपने नेताओं को भेजकर पार्टी ने यही संदेश दिया कि वह इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़ी है। इस पर वह अभी भी कायम है। जहां तक आगे लड़ाई की बात है, पार्टी लगातार केंद्र और भाजपा की नीतियों का विरोध कर रही है और आगे भी करती रहेगी।

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