मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अक्तूबर 2018 में इलाहाबाद शहर का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया। कहा गया कि यह शहर को उसका पुराना गौरव वापस दिलाने की एक कोशिश है। सरकार के आदेश के बाद सरकारी फाइलों में इलाहाबाद 'प्रयागराज' हो गया। लेकिन अभी भी यहां के हाईकोर्ट को 'इलाहाबाद हाईकोर्ट' और विश्वविद्यालय को 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय', और कैंट एरिया को 'इलाहाबाद कैंट' एरिया के नाम से ही जाना जाता है। शहर का नाम सरकारी फाइलों में प्रयागराज भले ही हो गया हो, लोगों के दिलों पर और उनकी जुबान पर अभी भी 'इलाहाबादी' ही चलती है।
हिंदी भाषा के विद्वान चंद्रहास त्रिपाठी ने कहा कि कोई भाषा किसी भी संस्कृति को जीवन देने वाली अविचल धारा होती है। यह हजारों साल की संस्कृति में पैदा होती है और लंबे समय में ही इसमें कोई बड़ा बदलाव दर्ज किया जाता है। प्रयाग शब्द पौराणिक आख्यान के अनुसार तो अच्छा लगता है लेकिन शहर की आबोहवा अभी भी 'इलाहाबाद' और 'इलाहाबादी' के नाम से जानी जाती है। अभी भी किसी को यहां आना हो तो वह यही कहता है कि वह 'इलाहाबाद' जा रहा है। किसी से पूछने पर वह अपना स्थान अभी भी 'इलाहाबाद' ही बताता है। प्रयागराज तो केवल सरकारी किताबों में दर्ज नाम है।
शहर का नाम बदल देने से भाषा-बोली का नाम नहीं बदल जाएगा
इलाहाबाद के आसपास के क्षेत्रों में हिंदी की एक विशेष बोली वाली शैली प्रसिद्ध है जिसे 'इलाहाबादी' कहा जाता है। इसमें उर्दू, फारसी, अवधि और भोजपुरी के शब्द शामिल हैं। शहर का नाम प्रयागराज कर देने से इस भाषा शैली का नाम 'प्रयागी' नहीं हो जाएगा। उसे तो 'इलाहाबादी बोली' या 'इलाहाबादी शैली' ही कहा जाएगा। जिस अमरूद का नाम पूरे विश्व में 'इलाहाबादी अमरूद' के नाम से जाना जाता है, अब उसे 'प्रयागी अमरूद' तो नहीं ही कहा जायेगा। उसकी पहचान इलाहाबाद से थी, और इलाहाबाद से ही रहेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ग्राहक 'इलाहाबादी अमरूद' ही खाने के लिए बाजार जाएगा। किसी एक ब्रांड को गढ़ने में सैकड़ों-हजारों वर्ष लगते हैं। इसे नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।