मशहूर कवि व पत्रकार नीलाभ अश्क का 70 साल की उम्र में उनके बुराड़ी स्थित निवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे।
उनके निधन के बाद शनिवार को निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उन्हें उनके भतीजों ने मुखाग्नि दी। बुराड़ी स्थित निवास में वह अपनी पत्नी भूमिका द्विवेदी के साथ रहे थे। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।
नीलाभ अशक के परिचित ने बताया कि उनके दो बेटे अमेरिका व पुणे में रहते हैं। 16 अगस्त 1945 को मुंबई में जन्मे नीलाभ वरिष्ठ साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क के पुत्र थे। नीलाभ ने इलाहाबाद में शिक्षा हासिल करने के बाद साहित्य का एक लंबा रास्ता तय किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए (स्नातकोत्तर) की पढ़ाई की थी।
वह लेखक, कवि अनुवादक और संपादन के अलावा पत्रकारिता से भी जुड़े थे। वर्तमान में वह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका रंग-प्रसंग के संपादकीय की जिम्मेदारी निभा रहे थे। चार साल तक लंदन में बीबीसी की हिंदी सेवा में भी बतौर प्रोड्यूसर उन्होंने काम किया।
वर्ष 1984 में स्वदेश वापसी के बाद वह पुन: लेखन व प्रकाशन कार्य से जुड़े। नीलाभ ने शेक्सपियर ब्रेत और लोर्का केनाटकों का अनुवाद भी किया था। उन्होंने अरूंधति रॉय के उस उपन्यास का हिंदी अनुवाद किया था जिसपर अरूंधति राय को बुकर पुरस्कार मिला था।
दरअसल, इस उपन्यास का नाम द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स था जिसे अश्क ने हिंदी में मामूली चीजों का देवता शीर्षक से अनुवादित किया था। इस समय वह अपने संस्मरणों पर आधारित ब्लॉग नीलाभ का मोर्चा लिख रहे थे।
उनकी प्रसिद्ध कृतियों में अपने आप से लंबी बातचीत, जंगल खामोश है, चीजें उपस्थित हैं, शब्दों से नाता अटूट है, शोक का सुख, अगले मोड़ के उस तरफ हैं, और ईश्वर को मोक्ष शामिल है। उन्होंने हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास नामक एक पुस्तक भी लिखी।