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UP Election 2022: अखिलेश तो सब समझ गए, लेकिन जयंत चौधरी न जानें कब समझेंगे!

शशिधर पाठक
Updated Thu, 18 Nov 2021 02:09 PM IST

सार

पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इन राज्यों में चुनाव पूर्व राजनीति धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंचती जा रही है। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा इन दिनों अपनी-अपनी खेमेबंदी को मजबूत करने में लगे हैं। भाजपा के पिछड़े चेहरे केशव प्रसाद मौर्य इन दिनों नाराज चल रहे हैं, वहीं चाचा शिवपाल का भतीजे अखिलेश पर अभी तक क्यों भरोसा बन नहीं पा रहा है। वहीं महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी बनाम केंद्र की लड़ाई कुछ नए गुल खिलाने वाली है। कुछ ऐसी ही राजनीति की दिलचस्प खबरें जानने के लिए पढ़ें हमारे विशेष कॉलम कानों-देखी में...
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यूपी चुनाव 2022: जयंत चौधरी व अखिलेश यादव - फोटो : Amar Ujala

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनाव का रोडमैप काफी हद तक समझ गए हैं। उन्होंने घोषणा भी कर दी कि समाजवादी पार्टी चुनाव-पूर्व गठबंधन करके मैदान में उतरेगी। उन्होंने राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर के साथ रथयात्रा के बहाने रोड-शो शुरू कर दिया है। हालांकि यह बात अभी राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी जयंत को कम समझ में आ रही है। खबर तो यह भी है कि जयंत समाजवादी पार्टी के अलावा कुछ और दलों की घंटी बजाने की कोशिश कर चुके हैं। इसकी भनक अखिलेश को भी लग चुकी है। बताते हैं पिछले दिनों अखिलेश ने बाकायदा जयंत से अपनी स्थिति साफ कर दी। जयंत को बता भी दिया कि वह उनकी पार्टी को कितनी सीटें दे सकते हैं। जयंत मान जाएं तो अच्छी बात। बताते हैं अब जयंत इस पर मुकम्मल अध्ययन कर रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। हालांकि उनकी पार्टी के जाट नेताओं का मानना है कि पिता और दादा की विरासत बचानी है तो बस ज्यादा तीन-पांच न करें। देखिए आगे क्या होता है?

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यूपी चुनाव 2022: जयंत चौधरी व अखिलेश यादव - फोटो : Amar Ujala
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनाव का रोडमैप काफी हद तक समझ गए हैं। उन्होंने घोषणा भी कर दी कि समाजवादी पार्टी चुनाव-पूर्व गठबंधन करके मैदान में उतरेगी। उन्होंने राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर के साथ रथयात्रा के बहाने रोड-शो शुरू कर दिया है। हालांकि यह बात अभी राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी जयंत को कम समझ में आ रही है। खबर तो यह भी है कि जयंत समाजवादी पार्टी के अलावा कुछ और दलों की घंटी बजाने की कोशिश कर चुके हैं। इसकी भनक अखिलेश को भी लग चुकी है। बताते हैं पिछले दिनों अखिलेश ने बाकायदा जयंत से अपनी स्थिति साफ कर दी। जयंत को बता भी दिया कि वह उनकी पार्टी को कितनी सीटें दे सकते हैं। जयंत मान जाएं तो अच्छी बात। बताते हैं अब जयंत इस पर मुकम्मल अध्ययन कर रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। हालांकि उनकी पार्टी के जाट नेताओं का मानना है कि पिता और दादा की विरासत बचानी है तो बस ज्यादा तीन-पांच न करें। देखिए आगे क्या होता है?

टीम राहुल में सब एक-दूसरे को किनारे लगाने में लगे हैं

बड़ी मेहनत से कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने सचिवालय की टीम बनाई थी। इस टीम पर लोगों को बड़ा आश्चर्य तब हुआ था जब रातों-रात तेज तर्रार पूर्व आईएएस अधिकारी के. राजू की इंट्री हो गई। के. राजू की एंट्री के बाद कभी विश्वस्त रहे पीएल पूनिया की पकड़ कमजोर होने लगी। अब खबर है कि कुछ दिनों से के. राजू ने खुद को बड़ा सीमित कर लिया है। इतना कि एक बार राहुल गांधी को भी पूछना पड़ा के. राजू कहां हैं? मतलब साफ है कि नहीं आ रहे हैं। खैर, खबर है कि राहुल ने बहुत जोर नहीं दिया। अब आएं तो ठीक, न आएं तो ठीक। मनाने नहीं जाएंगे। के. राजू के साथ ऐसा एक वर्ग और उससे जुड़े नेताओं की वजह से हुआ। दूसरे सदस्य हैं, अलंकार सवाई। अलंकार सवाई राहुल का सोशल मीडिया हैंडल कर रहे हैं। कौशल विद्यार्थी राहुल गांधी के साथ काफी समय से जुड़े हैं। कौशल को पता है कि कब, कैसे, कितना आगे-पीछे रहना है। यह संतुलन बनाए रखने के कारण उनकी जगह में कोई बड़ी छेड़छाड़ नहीं हो रही है। खबर तो यह भी है कि राहुल की टीम में जितने भी नए-पुराने आते हैं, आपस में ही एक-दूसरे को किनारे करने में लग जाते हैं।

हताश नहीं हैं केशव प्रसाद, उनके पास पार्टी के चुने विधायकों का मंत्र बचा है

उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हिम्मत न हारने वाले उत्साही नेताओं में से हैं। उन्हें हमेशा महसूस होता है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का उन्हें भरोसा हासिल है। यही भरोसा उन्हें उत्तर प्रदेश की महत्वाकांक्षा को मजबूत बनाते जाने की ताकत भी देता है। इसी ताकत के भरोसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में वे अपनी अलग कायनात बनाए हुए हैं। पिछड़ा और अन्य पिछड़ा वर्ग के विधायकों में भी उनके प्रति विश्वास रखने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। मौर्य अगस्त और सितंबर महीने में राजनीतिक अभियानों में काफी ज्यादा सक्रिय थे। लखीमपुर खीरी की घटना होने के बाद उनके कार्यक्रम में थोड़ी कमी आई थी। लेकिन अब फिर तेजी से सक्रिय हो रहे हैं। बताते हैं कि केंद्र के एक बड़े नेता ने उनका उत्साह कई गुना बढ़ा दिया है। नेता जी ने उन्हें मंत्र दिया है कि राजनीति में कभी शांत नहीं बैठना चाहिए। लिहाजा केशव प्रसाद फिर तेजी से सक्रिय हो रहे हैं। नेता जी ने दूसरा मंत्र भी दिया है कि भाजपा में विधायक दल का नेता पार्टी नहीं, चुने हुए विधायक करते हैं। इस मंत्र ने जैसे उनमें नई जान डाल दी है। लिहाजा जल्द ही वह एक बार फिर पूरा जोर लगाते दिखेंगे। इसके लक्षण सामने आने के बाद से दिल्ली में बैठे नेताजी भी काफी खुश हैं।

ये 'लड़की' आखिर उत्तर प्रदेश में कितना लड़ेगी?

प्रियंका गांधी के एक नारे को लेकर कुछ दलों की परेशानी बढ़ गई है। कांग्रेस महासचिव ने नारा दिया कि लड़की हूं, लड़ सकती हूं। उनके इस नारे का अगड़ी जातियों, स्कूल की छात्राओं पर असर होने लगा है। हालांकि भाजपा के प्रचार अभियान से जुड़े एक नेता का कहना है कि जितना कांग्रेस लड़ेगी, उतना ही सरकार विरोधी वोट बंटेगा। इसमें नुकसान सपा का ही है। बसपा प्रमुख मायावती के पार्टी के एक नेता कहते हैं कि प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की जड़ें सूख चुकी हैं। इसे हरा करने में प्रियंका को अभी काफी मशक्कत करनी है, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इसे काफी गंभीरता से ले रहे हैं। अखिलेश के करीबी एक नेता तो यहां तक कहते हैं कि प्रियंका की सक्रियता ने कांग्रेस पार्टी की तोलमोल की ताकत बढ़ा दी है। वहीं प्रियंका हैं कि अपने दरवाजे सभी के लिए खोलकर लगातार राजनीतिक अभियानों को बढ़ाती चली जा रही हैं। देखना है कि यह 'लड़की' कितना लड़ सकती है।

चाचा शिवपाल का क्या होगा, क्या बस वोट कटवा ही बने रहेंगे?

कभी मुलायम सिंह यादव की लाठी के नाम से मशहूर हुए शिवपाल सिंह यादव अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय करने के लिए तैयार हैं। इसके लिए उन्हें बस भतीजे अखिलेश यादव से 30-35 सीटों पर अपनी पसंद का उम्मीदवार खड़ा करने का भरोसा चाहिए। टीम अखिलेश के रणनीतिकार बताते हैं कि उनके नेता जी चाचा को साथ लेने के लिए 6-7 सीटों से अधिक की कुर्बानी नहीं दे सकते। दूसरे चाचा प्रो. राम गोपाल भी अपनी पार्टी में अपनी जगह और बेटे के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। चाचा की उम्मीद अब भी मुलायम सिंह यादव पर टिकी है। मुलायम भी चाहते हैं कि बहुत हो गया। अब अखिलेश को मान जाना चाहिए। अखिलेश का कहना है कि चाचा शिवपाल के पास यदि उत्तर प्रदेश में 30 सीटें जीतने वाले उम्मीदवार हैं तो नाम बता दें। हम भी चाहते हैं कि वह साथ में आ जाएं। अभी इधर यही चल रहा है। दूसरी तरफ खबर है कि शिवपाल सिंह अंदर से नाउम्मीद हो रहे हैं। उनके पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रजामंदी से लखनऊ में बड़ा बंगला है। वह जो भी सिफारिश कर देते हैं, सरकार के नेता अफसर उस पर कोई अड़ंगा भी नहीं लगाते। इसलिए बात नहीं बनी तो थोड़ा सोच-समझकर फैसला करेंगे। माना जा रहा है कि किसी भी फैसले की तस्वीर दिसंबर महीने के दूसरे सप्ताह तक साफ हो जाएगी।

मेरे छत्ते में हाथ डालोगे तो हम भी तुम्हें नहीं छोड़ेंगे!

महाराष्ट्र में एक राजनीतिक जंग चल रही है। इस जंग में पर्दे के पीछे का किरदार मराठा राजनीति के सरदार शरद पवार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निभाते हुए माना जा रहा है। अपने प्रिय अनिल देशमुख की राजनीति पर बड़ा बट्टा लगने के बाद भी शरद पवार तिलमिलाए थे। पहले दौर की इस लड़ाई में शिवसेना प्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के प्रिय मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह निपट गए। परमबीर सिंह के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने एक टीवी चैनल के राष्ट्रीय एंकर पर हाथ डलवाया था। लेकिन पहले दौर का पटाक्षेप होने से पहले दूसरे दौर की कहानी शुरू हो गई। इस साल जनवरी-फरवरी में ही महाराष्ट्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नवाब मलिक के दामाद के खिलाफ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अधिकारी ने कार्रवाई शुरू की। इसी अधिकारी ने बाद में बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के पुत्र पर घेरा डाल दिया। शाहरुख देश की एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी के नेता के साथ दोस्ताना संबंध के लिए जाने जाते हैं। खान का रसूख देश के बाहर भी है। सऊदी के प्रिंस से भी अच्छे रिश्ते हैं। बस फिर क्या था नवाब मलिक के कंधे पर पवार ने हाथ फिरा दिया है। यह एक तीर से कई निशाने साधने जैसा है। दोनों सहयोगी पार्टियां भी इससे खुश हैं। नवाब मलिक के पास पूरा पुलिंदा है और वह वार करने में जुट गए हैं।

मामला उल्टा पड़ता देख पीछे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रिय और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कूद पड़े। यह वही समय था, जब एनसीबी अधिकारी वानखेड़े को जेड प्लस सुरक्षा दी गई। फिर क्या था? अपनी रिश्तेदार, वानखेड़े की पहली पत्नी, उसके पिता के सहारे मलिक ने तमाम गोपनीय दस्तावेज के जरिए काफी कुछ उधेड़ दिया। दूसरी जंग में न केवल जांच अधिकारी बदला, बल्कि लड़ाई से बचाने के लिए कवच भी मजबूत किए गए। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ दिनों से दोनों तरफ से खामोशी है। हालांकि इसका मतलब जंग का खत्म होना भी जल्दबाजी ही कही जाएगी।

क्या सलमान खुर्शीद से नाराज हैं प्रियंका गांधी?

कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड जाएंगे तो आपको सलमान खुर्शीद की हाल में प्रकाशित किताब पर तरह-तरह की कहानी सुननी को मिलेगी। लोग खुसर-फुसर करते मिलेंगे कि प्रियंका गांधी सलमान खुर्शीद से बहुत नाराज हैं। लोग कारण भी पूछते मिलेंगे कि सलमान खुर्शीद अब इस तरह से सफाई क्यों दे रहे हैं? भाजपा मुख्यालय की तरफ जाइए। वहां एक अलग हवा बह रही है। लोगों का कहना है कि सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद विकलांगों के कल्याण का धन हड़पकर बैठी हैं। जांच उत्तर प्रदेश में चल रही है। इसलिए ऐसे समय में किताब और किताब में बोको हरम, आईएसआईएस से तुलना करके सलमान खुर्शीद ने भाजपा को बैठे बिठाए अवसर दे दिया है। ताकि जांच में राहत मिल जाए। वह इसके लिए सलमान की किताब को लेकर असहमत कांग्रेसियों का हवाला दे रहे हैं। अब इस तरह के सवालों को लेकर सलमान खुर्शीद के पास आइए। वह इस तरह के सवाल को हंसकर टाल जाते हैं। लिबरल सोच वाले सलमान खुर्शीद इस तरह की अटकलों पर बयान नहीं देना चाहते। वह कहते हैं कि वह कोई पुतला नहीं बन सकते। उनकी पार्टी के नेता गलत भी करें तो कुछ न बोलें? अपनी राय तो रखेंगे? अब सलमान साहब को लेकर कोई कहे भी तो क्या? वह वाक्य भी नहीं दोहराए जा सकते जो उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने पर कांग्रेसी ही बोल रहे थे।
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