प्रधानमंत्री मोदी राजकीय मेहमान के तौर पर अमेरिका में हैं। अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सदन को भी दूसरी बार संबोधित करेंगे। राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन ने प्रधानमंत्री को यह सम्मान देकर दुनिया में भारत का रुतबा बढ़ाया है। इससे पहले 2009 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी अमेरिका ने इसी स्तर का सम्मान दिया था। 2009 में भी अमेरिका का उद्देश्य बड़ा था। तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा से पूर्व प्रधानमंत्री की रिश्तों की केमिस्ट्री दिखाई भी दी थी। राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी कुछ खास इरादे से बराक ओबामा की डिप्लोमेसी को प्रधानमंत्री मोदी के अंदाज में दोहराया है। ऐसे में कूटनीतिक गलियारे में बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या अमेरिका की मंशा पूरी हो सकेगी?
क्या है अमेरिका की मंशा?
भारतीय राजनयिक, अमेरिका में रहे भारत के राजदूत समेत अन्य से चर्चा के बाद दिलचस्प पहलू सामने आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और यूक्रेन के युद्ध ने भू-राजनीतिक परिस्थिति में काफी बदलाव लाया है। यूरोप दो राहे पर खड़ा है। एक भारतीय राजनयिक का कहना है कि यूरेशिया में तीन महाशक्तियां हैं। रूस, चीन और भारत। रूस से भारत का 60 साल पुराना सामरिक साझीदारी का विश्वसनीय रिश्ता है। चीन से सीमा विवाद का मसला है, लेकिन भारत पड़ोसी देश चीन से किसी तरह के टकराव का इच्छुक नहीं है। अमेरिका से विश्वसनीय और मधुर रिश्ते की तर्ज रूस और चीन को नजरअंदाज करना भारत को मंजूर नहीं है। इससे बचना चाहता है। चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस के साथ खड़े रहने का संकेत दे रहा है। अमेरिका के साथ उसके हित टकरा रहे हैं। रूस ने यूक्रेन से युद्ध के बाद एशिया की तरफ विशेष तौर पर ध्यान देना शुरू किया है। भू-राजनीतिक रिश्तों के इस क्लाइमैक्स में अमेरिकी रणनीतिकार नया समीकरण बनाते नजर आ रहे हैं। वह लद्दाख में चीन की भारतीय भू-भाग पर नजर और चीन से भारत के रिश्ते में खटास का फायदा उठाने चाहते हैं। इसके साथ चाहते हैं कि भारत अब लेन-देन, खरीद-फरोख्त, सामरिक साझीदारी आदि समेत अन्य रिश्तों में रूस से दूरी बनाए।
विदेश मामलों पर नजर रखने वाले पूर्व एयरवाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि रूस से दूरी बनाना भारत के लिए दोधारी तलवार पर चलने जैसा होगा। यह अभी थोड़ा मुश्किल है। अभी तक भारत की नीति तटस्थता की रही है। मुझे लगता है कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की राह पर चलेगा।
मंशा पूरी करने के लिए अमेरिका के पास कौन से हथियार हैं?
भारत के प्रधानमंत्री ने देश को 2024-25 तक पांच खरब डालर की अर्थ व्यवस्था बनाने का ख्वाब दिखाया है। अमेरिका के रिश्तों के रणनीतिकार कहते हैं कि पांच खरब तो कुछ भी नहीं है। भारत की क्षमता अगले एक दशक में इससे भी कहीं और ज्यादा की अर्थव्यवस्था बनने की है। बताते चलें कि भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय व्यापार करीब 191 अरब डालर का है। अमेरिकी रणनीतिकार इसी नजरिए से भारत की तरफ देख रहे हैं। उन्हें भारत रक्षा, तकनीक, विज्ञान समेत तमाम क्षेत्रों में बड़े बाजार के रूप में दिखाई पड़ रहा है। अमेरिका के राजनयिक लद्दाख में चीन की सैन्य धमक को भी अपने उद्देश्य से जोड़ रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय में माइक पोम्पियो ने चीन को लेकर काफी सख्त वक्तव्य दिए थे। अमेरिका रक्षा मंत्री आस्टिन के भारत दौरे के समय भी भारत की रक्षा जरूरतों पर अमेरिकी निगाह का अंदाजा हो रहा था।
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के पिछले कुछ महीनों के वक्तव्य उनके उद्देश्य की तरफ साफ ईशारा करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेके सुलविन ने कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। वह अपने समकक्ष से भी मिले थे। पूर्व विदेश मंत्री शशांक कहते हैं कि सीआईए का होमवर्क कमजोर नहीं होता। इसके लिए थोड़ा पीछे जाएं तो पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद करीब एक साल भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति के रिश्ते खासे गर्मजोशी वाले थे। यहां तक कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की चुटकी ली थी। यही स्थिति राष्ट्रपति जो बाइडन के भी सत्ता में आने के बाद दिखाई दे रही थी। लेकिन जैसे ट्रंप प्रशासन ने यू-टर्न लिया, ठीक उसी की पुनरावृत्ति करते हुए जो बाइडन ने भी खुद को प्रधानमंत्री मोदी का फैन तक बता दिया। प्रधानमंत्री अमेरिका में हैं और जो बाइडन चीन के अपने समकक्ष शी जिनपिंग को तानाशाह करार दे रहे हैं। भारतीय राजनयिकों का मानना है यही तो अमेरिका की नीति, विदेशनीति, कूटनीति सब है। भारत की अहमियत यूं ही नहीं बढ़ रही है।
भारत की चिंता ही अमेरिका का अवसर
इतिहास एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है। वह अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन का दौर था, जब भारत और अमेरिका के रिश्ते तल्ख हो गए थे। 1965 में अमेरिका ने भारत को रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण हथियारों को देने में अरुचि दिखाई थी। तब भारत ने रूस का रूख किया था। वर्तमान में भारत की रक्षा जरूरतों के रूस से पूरा हो पाने में अड़चने आ रही हैं। फाइटर जेटों के अत्याधुनिकीकरण कार्यक्रम, रक्षा सौदे और आपूर्ति में काफी समस्या आ रही है। एस-400 मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति में देरी हो रही है। बताते हैं अमेरिका के लिए यही अवसर है। अमेरिका के रणनीतिकारों को पता है कि भारत को चीन से चुनौती और चिंता दोनों है। पाकिस्तान से सीमापार का खतरा रहता है। इसलिए रक्षा क्षेत्र में अपनी मजबूती भारत की मजबूरी है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि रूस भारत का सामरिक, रणनीतिक साझीदार है, लेकिन चीन से संबंध की शर्त के आड़े आने पर वह तटस्थ चल रहा है। यही अवसर अमेरिका के लिए रक्षा क्षेत्र का बहुत बड़ा बाजार है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान पर गौर कीजिए
भारतीय राजनयिकों ने पहले भी अमेरिका से आग्रह किया था कि अमेरिका के राजनयिक लद्दाख में चीन के सैनिकों की धमक से जोड़कर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी आक्रमकता के खिलाफ कुछ न बोलें। भारत में अमेरिका के राजदूत रहे केनेथ जस्टर ने भी भारत से मिली हिदायत की जानकारी दी थी। भारत ने नहीं चाहा है कि उसके और अमेरिका के रिश्तों के बीच में चीन का जिक्र आए। क्वैड के मामले में भी। यानी भारत चीन की नाराजगी नहीं मोल लेना चाहता। कुछ मिलाकर चीन से अमेरिका की कारोबारी प्रतिस्पर्धा में भारत फंसने से बचना चाहता है। जबकि अमेरिका के राजनयिक इसमें घसीटने का जाल बिछा रहे हैं।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इकोनॉमिस्ट को दिए साक्षात्कार में साफ कहा है कि भारत के लिए रूस से संबंध महत्वपूर्ण हैं। यह लेन-देन के दायरे से परे हैं। भारत के लिए रूस का भू-राजनीतिक महत्व अधिक है। जयशंकर ने साफ कहा कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस एशिया की तरफ रिश्तों पर ध्यान दे रहा है। ऐसे में भारत और रूस के रिश्ते बढ़ेंगे। इसके साथ-साथ भारत और अमेरिका की साझेदारी भी मजबूत होगी। कहने अर्थ साफ है कि भारत किसी एक दिशा में नहीं चलेगा। इसी को विदेश मंत्रालय के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी आधार बनाकर कहते हैं कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बनेगा।
प्रधानमंत्री मोदी के तमाम तोहफे लेकर लौटने की उम्मीद
प्रधानमंत्री राजकीय मेहमानबाजी पूरी करके जब मिस्र होते हुए दिल्ली लौटेंगे, तो उनके रिश्तों के सूटकेस में काफी कुछ होने की उम्मीद है। रक्षा क्षेत्र में अमेरिकी ड्रोन भारत को मिलना तय माना जा रहा है। पहले अमेरिका इस ड्रोन को देने में हीला हवाली कर रहा था। भारत के हल्के एवं उन्नत लड़ाकू विमान तेजस के लिए जेट इंजन का सौदा ला सकते हैं। हालांकि माना जा रहा है कि अमेरिका इसकी महत्वपूर्ण तकनीक भारत को नहीं देगा। अमेरिका से रवाना होने के पहले वॉशिंगटन सामरिक, रणनीतिक और विश्वसनीय साझीदारी का ठोस भरोसा भी देगा। इसके अलावा बहुत कुछ का अनुमान है। भारत को नाटो प्लस में लाने का सपना या फिर क्वैड को लेकर राष्ट्रपति जो बाइडन के बयान को भी अमेरिकी विदेश मंत्रालय के रणनीतिकारों की पहल के रूप में देखा जा रहा है।