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PM Modi In Ukraine पोलैंड दौरे के बाद यूक्रेन जाकर PM मोदी ने कैसे इतिहास रचा? संतुलन साधने का कौशल बेमिसाल

सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युद्धग्रस्त यूक्रेन जाना चर्चा में है। इससे पहले पोलैंड की धरती से पीएम मोदी ने शांति की पहल करते हुए साफ संदेश दिया था कि वर्तमान दौर युद्ध का नहीं है और भारत बुद्ध की धरती से पूरी दुनिया को संघर्ष विराम और शांति का संदेश देना चाहता है।
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पीएम मोदी यूक्रेन दौरे पर राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बड़ा उद्देश्य लेकर यूक्रेन दौरे पर गए। विदेश मंत्रालय के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, पोलैंड में कूटनीतिक पारी खेलने के बाद प्रधानमंत्री यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचे।राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से मुलाकात के दौरान दोनों के बीच चार अहम समझौते हुए। इसके अलावा दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच कई द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा भी हुई।पीएम मोदी ने युद्ध छोड़कर वार्ता की मेज पर संवाद कर समस्या के समाधान का आह्वान किया। ऐसे में माना जा रहा है कि सब कुछ ठीक रहने पर प्रधानमंत्री मोदी इतिहास बनाकर स्वदेश लौटेंगे। इस यात्रा से प्रधानमंत्री रूस के साथ भारत के हित में रिश्ता, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और यूक्रेन के साथ सद्भाव की कूटनीति को साधेंगे।
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विदेश मंत्रालय के एक पूर्व सचिव का कहना है कि इतिहास रचा जा रहा है क्योंकि पीएम मोदी यूक्रेन को संप्रभु देश के रूप में मान्यता मिलने के बाद वहां जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री के यूक्रेन जाने की योजना पर कुछ समय पहले से काम हो रहा था। भारत भी एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है। वैश्विक मंच से आतंकवाद के विरुद्ध आवाज उठाने वाला देश है। हमारी नीति में कभी भी समस्या के समाधान में युद्ध नहीं रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इसी का संदेश देने के लिए यूक्रेन जा रहे हैं।



इस कूटनीति के मास्टर हैं विदेश मंत्री एस जयशंकर
देश के पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर कूटनीति के मास्टर हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के मझे हुए खिलाड़ी जयशंकर ने पिछले कुछ सालों में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को जो धार दी है, वह अपने आप में एक नजीर है। यूरोप की धरती पर बैठकर भारत ने रूस से अपने कच्चे तेल के आयात को सही ठहराया और सबसे दिलचस्प है कि भारत के इस रुख पर अमेरिका, यूरोप और तेल के उत्पादक खाड़ी के देशों की कोई चुभने वाली प्रतिक्रिया नहीं आई। दुनिया के विकासशील देशों को भी भारत के इस रुख से लाभ मिला। सभी को पता है कि भारत के इतने बड़े पैमाने पर रूस से कच्चे तेल के आयात के कारण ओपेक देशों की मनमानी नहीं चल पाई। मध्यपूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर तनाव के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तेल की कीमतों में कोई बड़ा उछाल नहीं आ सका है।
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रूस और अमेरिका के साथ-साथ यूरोप से भी हैं भारत के रिश्ते
पाकिस्तान में अपनी सेवाएं दे चुके पूर्व राजनयिक का कहना है कि भारत रूस को दरकिनार नहीं कर सकता। रूस भारत का पुराना और विश्वसनीय सामरिक साझीदार देश है। भारत के 80 प्रतिशत के करीब रक्षा के साजो-सामान (नए और पुराने मिलाकर) रूस से हैं। 40-42 प्रतिशत सैन्य साजो-सामान की खरीद फरोख्त रूस से करते हैं और तीनों सेनाओं के सैन्य हार्डवेयर के कल-पुर्जे, मरम्मत के लिए भी रूस पर ही निर्भर है। रूस से भारत अपनी जरूरत का 46.5 अरब डालर मूल्य का ईधन तेल आयात करता है। इतनी बड़ी मात्रा में किसी देश को तेल की आपूर्ति मायने रखती है। इसके कारण तेल उत्पादक देशों की मनमानी नियंत्रण में है।

रक्षा क्षेत्र में सहयोग, खरीद-फरोख्त बढ़ी
सूत्र का कहना है कि भारत की इस विवशता को अमेरिका, यूरोप सभी समझते हैं। इस मुद्दे पर विदेश मंत्री एस जयशंकर काफी मुखर होकर भारत का पक्ष रख चुके हैं। दूसरे, मुश्किल समय में रूस ने भारत का साथ दिया है। रूस की तरह ही भारत अब अपनी सैन्य जरूरतों को यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका, इस्राइल समेत अन्य देशों से भी पूरा करता है। पिछले कुछ दशक से फ्रांस मिराज, स्कार्पिन पनडुब्बी, राफेल लड़ाकू विमान समेत तमाम साजो-सामान का सौदा हुआ है। अमेरिका से रक्षा क्षेत्र में सहयोग, खरीद-फरोख्त बढ़ी है। 2000 से इजरायल के साथ बड़े पैमाने पर रक्षा सौदे हुए हैं।

सबके साथ संतुलन साधने का कौशल जानते हैं प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा का एक बड़ा मकसद सभी के साथ संतुलन साधना है। बताते हैं कि फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर सैन्य आक्रमण शुरू कर दिया था। तभी से भारत एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा से गुजर रहा है। भारत ने इस दौरान संयुक्त राष्ट्र के मंच से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के लगभग मंच पर लगातार रूस का साथ दिया है। रूस के राष्ट्रपति के साथ शंघाई सहयोग संगठन जैसे कई मंचों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जाने से भी परहेज किया है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में रूस की यात्रा भी की थी।

सैन्य टकराव का समर्थन नहीं
राष्ट्रपति पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता का संयुक्त बयान भी जारी हुआ था। प्रधानमंत्री ने पुतिन की मौजूदगी में रूस-यूक्रेन युद्ध पर अपनी बात रखी थी। उस समय नाटो देशों की बैठक चल रही थी और ऐसे समय में प्रधानमंत्री की रूस यात्रा अमेरिका नाराजगी जताई थी। इस बार प्रधानमंत्री यूक्रेन जा रहे हैं। उनकी यूक्रेन की यात्रा पर रूस की भी तीखी प्रतिक्रिया आ सकती है। लेकिन भारत का मानना है कि उसके पास एक स्वतंत्र विदेश नीति है। भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। कभी भी युद्ध, आतंकवाद और सैन्य टकराव का समर्थन नहीं करता। समस्या के समाधान के लिए संवाद की मेज को वरीयता देता है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री की यूक्रेन की यात्रा इसी कूटनीति को साधने के लिए है। ताकि लगातार बदल रही भू राजनीतिक परिस्थिति में भी भारत अपनी तटस्थ विदेश नीति का संदेश दे सके। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री की यूक्रोन की यात्रा को आगे बढ़ाने से पहले बड़े पैमाने पर होमवर्क हुआ है।
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