पंजाब में पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा चूक मामले में नया मोड़ आता जा रहा है। शनिवार को पंजाब सरकार द्वारा इस केस में दर्ज की गई एफआईआर की प्रति जब मीडिया में आई, तो उसमें कई चौंकाने वाले तथ्य देखने को मिले। प्रधानमंत्री मोदी का काफिला क्यों फंसा, इस केस में आईपीसी-283 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें प्रधानमंत्री की सुरक्षा का उल्लंघन, किसान आंदोलन या बाधा का कोई जिक्र ही नहीं है। यह धारा हल्के जमानती अपराध के अंतर्गत आती है। इसमें अधिकतम 200 रुपये का जुर्माना हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी की सुरक्षा चूक का मामला पंजाब के मुख्यमंत्री 'चन्नी' के गले की फांस बन सकता है। वे जिन 'आईपीएस' को बचाना चाह रहे हैं, वे केंद्र के निशाने पर हैं। केंद्र की जांच कमेटी ने शुक्रवार को पंजाब पुलिस के 13 अफसरों को तलब किया था। अगर केंद्र की जांच में आईपीएस दोषी साबित होते हैं तो उन्हें निलंबन, जबरन रिटायरमेंट और स्थायी तौर पर नौकरी से निकालना जैसी सजा दिए जाने का प्रावधान है।
जब रूट क्लीयर था तो पीएम की गाड़ी आगे बढ़ गई। इसके बावजूद अगर रूट पर कुछ दिक्कत होती है, तो उसके लिए स्थानीय पुलिस 'सेफ हाउस' का इंतजाम करती है। इसके माध्यम से विकट परिस्थिति में पीएम को शेल्टर रूट पर ले जाया जा सके। बतौर यशोवर्धन आजाद, पंजाब पुलिस की यह बड़ी गलती रही है कि वे उस मार्ग को खाली नहीं करा सके, जहां से पीएम को गुजरना था। पंजाब पुलिस को पूरी ताकत लगा देनी चाहिए थी। भले ही पंजाब पुलिस अब इस केस को लेकर जैसी भी एफआईआर दर्ज कर रही है, लेकिन लापरवाह अफसर केंद्र सरकार की जांच कमेटी से बच नहीं सकेंगे। जांच रिपोर्ट में अगर कोई आईपीएस दोषी साबित होता है तो उसे निलंबर, वेतन वृद्धि रोकना या कम करना, जबरन रिटायरमेंट और पुलिस सेवा से निकाल देना जैसे बड़े दंड का सामना करना पड़ सकता है।
पंजाब पुलिस द्वारा इस मामले में जो प्राथमिकी दर्ज की गई है, उसमें उन लोगों या संगठनों की संख्या का कोई जिक्र नहीं है, जिनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी का काफिला 20 मिनट तक सड़क पर फंसा रहा। कुलगढ़ी के थाना प्रभारी बीरबल सिंह को इस केस में शिकायतकर्ता बनाया गया है। हैरानी की बात है कि पुलिस ने किसी एक आरोपी का नाम भी एफआईआर में नहीं लिखा। डेढ़ सौ अज्ञात लोग, केवल इतना लिख दिया गया है। सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर किसान संगठन बीकेयू (क्रांतिकारी) के पदाधिकारी राजमार्ग को अवरुद्ध करने में अपनी भागीदारी की पुष्टि कर रहे थे, लेकिन इसके बाद भी पंजाब पुलिस की एफआईआर में उनका नाम नहीं लिखा है। पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की है। सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि पंजाब पुलिस की एफआईआर से इतना इशारा मिल गया है कि वह इस केस में किसी को फंसाना नहीं चाहती। ऐसे में आईपीएस और निचले स्तर के पुलिस कर्मचारी साफ बच निकलेंगे।
इस मामले में केंद्र सरकार ने जो जांच कमेटी गठित की है, उसने शुक्रवार को पंजाब पुलिस प्रमुख के (डीजीपी) एस चट्टोपाध्याय और दूसरे 12 सीनियर अधिकारियों को पूछताछ के लिए तलब किया था। बता दें कि शनिवार को पंजाब सरकार ने वीरेश कुमार भवरा को डीजीपी बना दिया है। एडीजीपी जी नागेश्वर राव ने पीएम के दौरे से पहले एक मीडिया बाइट में कहा था कि उन्हें जितने भी खतरे के अलर्ट मिले हैं, उन सब को लेकर सुरक्षा पुख्ता की जा रही है। ड्रोन हमले की आशंका के मद्देनजर स्पेशल टीम लगाई गई हैं। किसान अगर रास्ते में आते हैं तो उन्हें हटा देंगे। इनके अलावा एडीजीपी जितेंद्र जैन, आईजी पटियाला मुखविंदर सिंह चिन्ना, फिरोजपुर के डीआईजी इंद्रबीर सिंह, फरीदकोट के डीआईजी सुरजीत सिंह, फिरोजपुर के डीसी दविंदर सिंह, एसएसपी हरमनदीप हंस, मोगा के एसएसपी चरणजीत सिंह सोहल और बठिंडा के एसएसपी अजय मलूजा आदि से पूछताछ जा रही है।
कैबिनेट सचिवालय में सचिव (सुरक्षा) सुधीर कुमार सक्सेना, आईबी के संयुक्त निदेशक बलबीर सिंह और एसपीजी के आईजी एस सुरेश, केंद्र की जांच टीम में शामिल हैं। गृह मंत्रालय पहले ही इस मामले में गंभीर चूक होने की बात कह चुका है। चूंकि इस मामले में शीर्ष अफसरों के बीच अलर्ट और दूसरे संदेशों का आदान प्रदान हुआ है। निचला स्टाफ तो वही करता है, जैसा उन्हें सीनियर अधिकारियों से आदेश मिलता है। पीएम के दौरे को लेकर निर्णय लेने का अधिकार केवल शीर्ष अधिकारियों के पास होता है। एसपीजी को पीएम के रूट क्लीयर होने की जानकारी डीजीपी ने दी थी। उसके बाद भी रूट को क्लीयर नहीं कराया जा सका। केंद्र की जांच टीम इसी बात का पता लगा रही है कि अफसरों के बीच कहां से आदेशों पर अमल करने की चेन टूटी है। पंजाब सरकार ने भी अपनी तरफ से इस मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मेहताब सिंह गिल और प्रमुख सचिव, गृह मामलों और न्याय, अनुराग वर्मा की एक समिति का गठन किया है। लिहाजा, आईपीएस की कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी, केंद्रीय गृह मंत्रालय होता है, ऐसे में लापरवाह अधिकारी कार्रवाई से बच नहीं सकेंगे।