वैसे तो भाजपा के पास केंद्र से लेकर राज्यों तक कई दलित चेहरे हैं। इनमें भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य, केंद्रीय राज्य मंत्री मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सांसद दुष्यंत कुमार गौतम , यूपी से सांसद विनोद सोनकर, सांसद रमाशंकर कठेरिया,पूर्व आईपीएस और दलित नेता बृजलाल, बीपी सरोज जैसे कद्दावर नेता हैं।
मध्यप्रदेश से भाजपा के वरिष्ठ दलित नेता और उज्जैन से पूर्व सांसद प्रो. चिंतामणि मालवीय ने अमर उजाला से कहा कि, भाजपा ही दलितों की वास्तविक प्रतिनिधि करने वाला दल है। आज देश में आरक्षित क्षेत्र में सबसे ज्यादा लोकसभा और विधानसभा सीटें भाजपा के पास ही हैं। वहीं, कौशांबी से सांसद विनोद सोनकर ने कहा, भाजपा बहुत बड़ी पार्टी हैं। यहां हर वर्ग हर समाज के लोगों की पर्याप्त संख्या हैं।
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार ने अमर उजाला से बात करते हुए कहा, केंद्र में जब से भाजपा सत्ता में आई है तब से पार्टी ने दलित वोट बैंक को अपने तरफ लाने के लिए कई प्रयास किए हैं। भाजपा हमेशा से दलित और लोअर ओबीसी क्लास के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश करती आई है। संजय कुमार कहते हैं कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी इन दोनों समुदाय के मतदाताओं को रुझाने में काफी हद तक सफल रही है।
उन्होंने आगे कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में विस्तार में जरूर दलित चेहरों को आगे रखा जाएगा ताकि इस वोट बैंक पर पार्टी की पकड़ मजबूत रह सके। उन्होंने बताया कि, भाजपा का दलितों को अपने तरफ लाने का ही ये प्रयास है कि राष्ट्रपति के बाद कई लोगों को राज्यपाल बनाया और अब मंत्री बनाने की चर्चा हो रही है। उम्मीद है कि नए मंत्रिमंडल में दो से तीन दलित चेहरे जरूर होंगे। यूपी से भी एक दलित चेहरे को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है।
संजय कुमार बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति में दलित राजनीति का बहुत बड़ा वोट बैंक है। पंजाब में 27 फीसदी दलित समुदाय के लोग हैं। उत्तराखंड की राजनीति ब्राह्मण और राजपूत की होती है लेकिन यहां भी दलित समुदाय के लोग 20 फीसदी तक हैं। थावरचंद की जगह यूपी से किसी बड़े दलित चेहरे को मौका मिल सकता है। जिससे बसपा का वोट बैंक को तोड़ा जा सके और लोवर ओबीसी मतदाताओं पर पकड़ मजबूत हो सके।