न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, एक नियम के आधार पर उनकी शादी के कारण उनको नौकरी से हटाना अवैध था। ऐसा नियम स्पष्ट रूप से मनमाना है। महिला ने शादी की है, तो इसके लिए उसके रोजगार को खत्म करना लैंगिक भेदभाव और असमानता का एक बड़ा मामला है। ऐसे पितृसत्तात्मक नियम को स्वीकार करना मानवीय गरिमा, गैर-भेदभाव के अधिकार और निष्पक्ष व्यवहार को कमजोर करता है।
लखनऊ स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने उन्हें सभी परिणामी लाभों के साथ बहाल करने का फैसला दिया था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी थी। हालांकि, शीर्ष न्यायालय की पीठ ने कहा कि एएफटी के फैसले में दखल देने की जरूरत नहीं है।
हम कोई भी दलील स्वीकार करने में असमर्थ: सर्वोच्च न्यायालय
पीठ ने कहा, हम इस तरह की कोई भी दलील मानने में असमर्थ हैं कि प्रतिवादी (जो सैन्य नर्सिंग सेवा में एक स्थायी कमीशन अधिकारी थी) को इस आधार पर नौकरी से हटाया जा सकता है कि उन्होंने शादी कर ली थी। अदालत को बताया गया कि 1977 के सेना निर्देश संख्या 61 (सैन्य नर्सिंग सेवा में स्थायी कमीशन देने के लिए सेवा के नियम और शर्तें) को 29 अगस्त, 1995 को बाद के एक पत्र से वापस ले लिया गया था। पीठ ने कहा कि लिंग आधारित पूर्वाग्रह पर आधारित कानून और नियम सांविधानिक रूप से अस्वीकार्य हैं और महिला अधिकारियों की शादी और उनकी घरेलू भागीदारी को पात्रता से वंचित करने का आधार बनाने वाला नियम असंवैधानिक है।