केरल के विधानसभा चुनाव में इस बार पिछड़े इड़वा समुदाय की खासी चर्चा है। इस समुदाय का सियासी असर देखने के लिए इस तटीय जिले की कोल्लम सीट से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, जहां लेफ्ट फ्रंट, यूडीएफ और एनडीए तीनों के उम्मीदवार इड़वा समुदाय से आते हैं। लेफ्ट फ्रंट की ओर से माकपा ने यहां मलयाली फिल्म स्टार मुकेश, कांग्रेस (यूडीएफ) के सूरज रेवी और भाजपा (एनडीए) के के शशिकुमार उम्मीदवार हैं।
इस सीट के दोनों प्रमुख उम्मीदवार राजनीतिक परिवारों से भी आते हैं। गॉड फादर, रामजीराव स्पीकिंग और इन हरिहरनगर जैसी सुपर हिट फिल्म के अभिनेता मुकेश के पिता ओ माधवन भी फिल्मों से जुड़े होने के साथ ही 18 बरस तक पंचायत अध्यक्ष भी रहे। सूरज रेवी दिवंगत पूर्व विधायक थोपिल रेवी के बेटे हैं। शशिकुमार कॉलेज से सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं। कोल्लम सीट का जातिगत गणित देखें तो यहां इड़वा समुदाय सर्वाधिक है। उसके बाद मुस्लिम और नायर आते हैं।
काजू फैक्टरियों, मछली के कारोबार और नारियल की रस्सी से जुड़े उद्योगों में इड़वा समुदाय के श्रमिकों की संख्या अच्छी खासी है। लिहाजा इस श्रमिक बहुल सीट पर तीनों उम्मीदवार इस समुदाय के लोगों को लुभाने में जुटे हैं। हालांकि मुकेश और सूरज रेवी दोनों इस बात से इंकार करते हैं कि उन्हें इड़वा होने के कारण पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है। अपने विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के बीच इड़वा समुदाय की एक शादी में शामिल होने जा रहे मुकेश ने इस संवाददाता से कहा, 'मैं जातिगत आधार पर चुनाव नहीं लड़ रहा हूं। मैं यहां श्रमिकों के हितों की लड़ाई लड़ने आया हूं। काजू फैक्टिरयां बंद पड़ी हैं, जिसके कारण श्रमिकों का बुरा हाल है। मछुआरों की स्थिति भी ठीक नहीं है।
राज्य की यूडीएफ सरकार और केंद्र की एनडीए सरकार की नीतियां श्रमिक विरोधी हैं।' दूसरी ओर यूडीएफ के सूरज रेवी मुकेश कहते हैं कि लेबर प्रॉब्लम नहीं, असली मुद्दा यहां वेस्ट मैनेजमेंट का है। पीने के पानी का है। यह विधानसभा सीट दस वर्ष से माकपा के पास है। कॉरपोरेशन भी माकपा के पास है। इसके बावजूद उसने कुछ नहीं किया। शहर के हर जंक्शन (चौराहे) पर मुकेश के पोस्टरों में मलयालम फिल्मों के दूसरे सितारों की फोटो भी नजर आती है। हालांकि सूरज रेवी कहते हैं कि मुकेश का स्टारडम कोई मुद्दा नहीं है। तो मुकेश कहते हैं कि यहां लड़ाई यूडीएफ और एलडीएफ की नीतियों के बीच है। दोनों उम्मीदवार एक दूसरे को ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मान रहे हैं।
बातचीत में वे एनडीए उम्मीदवार शशिकुमार का जिक्र तक नहीं करते। हालांकि यहां लड़ाई इस बात पर खासी निर्भर है कि शशिकुमार को कितने वोट मिलते हैं। श्रमिक बहुल होने के नाते पारंपरिक रूप से यहां लेफ्ट का बड़ा आधार है। कॉरपोरेशन के अलावा दोनों पंचायतों पर उसका कब्जा है। दोपहर केरल के दूसरे शहरों की तरह यहां भी पारा पैंतीस डिग्री के आसपास है। सियासी तपन बढ़ते जा रही है। कोल्लम की मछुआरा बस्ती में पानी का टैंकर पहुंच चुका है। बच्चे और महिलाएं घरों से निकलकर टैंकर के पास पहुंच रही हैं। अरब सागर की लहरों को दूर से देखते मछुआरे ताश की पत्तियां खेलते वक्त काट रहे हैं। वे सियासत पर बात करने को तैयार नहीं हैं। संभवतः भाषा की भी कुछ अड़चन है। यहां की सियासी लहरें किसे किनारे लगाएंगी अभी पता नहीं।