पाकिस्तान की हद से ज्यादा अफगानिस्तान में दखलअंदाजी के बाद मध्य एशिया में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। इसी के मद्देनजर रूस की सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख जनरल निकोलाई पेत्रुशेव और भारत के सुरक्षा और खुफिया विभागों के प्रमुख जिम्मेदारों के साथ हुई बैठक में पाकिस्तान की इसी दखलअंदाजी को लेकर खुलकर चर्चा भी हुई। जानकारी के मुताबिक भारत और रूस ने अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता के दिखने और होने वाले दुष्प्रभाव से निपटने के लिए साझा रणनीति भी बनाई है। भारत ने रूस के सुरक्षा परिषद के प्रमुख जनरल को इस बात से भी अवगत कराया है कि पाकिस्तान का सीधा हस्तक्षेप अफगानिस्तान में तालिबानियों के साथ है। भारत ने चिंता जाहिर करते हुए रूस, अमेरिका और ब्रिटेन के सुरक्षा और खुफिया विभाग के साथ स्पष्ट तौर पर कहा है कि पाकिस्तान के दखल के साथ अफगानिस्तान की जमीन पर आतंकवाद को न सिर्फ बढ़ावा मिलेगा बल्कि मध्य एशिया समेत दक्षिण एशिया में भी अफगानिस्तान की जमीन में पनपने वाले पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा इस्लामिक चरमपंथियों विषय पर आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए अफगानिस्तान की सीमाओं से ना सिर्फ हथियार और आतंकवादियों का दूसरे मुल्कों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि पूरी दुनिया में अफीम और चरस की भी तस्करी शुरू हो जाएगी। जो नारको टेररिज्म को बढ़ावा देगी।
भारत के साथ हर तरीके के समझौते को लेकर आगे बढ़ने वाले तालिबानी नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई को पाकिस्तान की शह पर ही सरकार में किनारे लगा दिया गया। विदेश मामलों के जानकार एलएन राव कहते हैं कि सिर्फ स्तानिकजई ही नहीं बल्कि मुल्ला बरादर को भी पाकिस्तान की शह पर ही पहले से तय पद नहीं दिया गया। राव कहते हैं कि यह तो तालिबानी नेता अमेरिका और अन्य देशों के साथ कतर में हुई शांति समझौते की बैठकों में न सिर्फ अहम भूमिका निभा रहे थे, बल्कि तालिबान के बदले हुए स्वरूप को लेकर भी आगे चलने को राजी थे। लेकिन यह बात पाकिस्तान को बर्दाश्त नहीं हुई और उसने तालिबानियों को 'पंजशीर' पर कब्जा करने के लिए न सिर्फ अपने सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए बल्कि पंजशीर में हमले तक किए। यही वजह रही कि तालिबानियों ने पाकिस्तान पर और ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया, इसी के साथ पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपना नया खेल करना शुरू कर दिया।