विदेशी मामलों के जानकार कर्नल (रि.) जीडी पुरी कहते हैं कि पाकिस्तान को आप तालिबान मानकर चलिए। बस अंतर इतना है कि पाकिस्तान खुलकर शरिया कानून की सिफारिशें लागू नहीं कर पा रहा है लेकिन जहां उसे मौका मिलता है वहां पर वह तालिबानी सरकार के मार्फत इस बात का संदेश देने की कोशिश करता है कि वह अफगानी तालिबानी इस्लामिक मूवमेंट के साथ में जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि पाकिस्तान में शरण पाए हुए अफगानी लोगों को वापस उनके मुल्क जबरदस्ती भेजे जाने की शुरुआत कर दी है।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबानी सरकार नहीं चाहती है कि अफगानी नागरिक देश छोड़कर जाए। ऐसे में उन सभी देशों पर तालिबान की सरकार ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है, जहां से अफगानी नागरिकों को वापस उनके मुल्क भेजा जा सके। पाकिस्तान इसमें सबसे ज्यादा अफगानिस्तान का सहयोगी बन रहा है। सूत्रों का कहना है कि हक्कानी और फैज हमीद के बीच हुई बातचीत में तय हुआ है कि खासतौर से कराची और आसपास के इलाकों में शरण लेकर पहुंचे अफगानियों को धीरे-धीरे वापस अफगानिस्तान भेजा जाएगा। हालांकि इसे लेकर अफगानिस्तान के शरणार्थियों में पाकिस्तान में ही विरोध होना शुरू हो गया है। लेकिन आईएसआई और सेना ने योजना मुताबिक सबको वापस भेजने की तैयारी कर ली है। एमनेस्टी के लिए साउथ एशिया में काम कर चुकी शाकिया कहती हैं कि यह पाकिस्तान की ओर से मानवाधिकारों के खिलाफ के सबसे खतरनाक सौदा है। वह कहती हैं अगर इसी तरीके से अफगानी शरणार्थियों को तालिबानियों के सुपुर्द कर दिया जाएगा तो उनकी जान बचाना मुश्किल होगा।