पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने बड़ा कूटनीतिक पत्थर क्यों न उछाला हो, लेकिन भारत पाकिस्तान के किसी झांसे में आने वाला नहीं है। सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने पाकिस्तानी समकक्ष नासिर खान जंजुआ से शुक्रवार को फोन पर हुई बातचीत में स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के साथ मधुर और विश्वसनीय रिश्तों की पक्षधर है, लेकिन नई दिल्ली या इस्लामाबाद में विदेश सचिव की वार्ता के लिए पाकिस्तान को आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई करनी होगी।
भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि जबतक आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई के अपने वादे में इस्लामाबाद प्रतिबद्धता नहीं दिखाता, तबतक विदेश सचिवों की नई दिल्ली या फिर इस्लामाबाद में समग्र शांति वार्ता मुश्किल है। अर्थात पाकिस्तान पहले पठानकोट हमले के सूत्रधारों के खिलाफ कार्रवाई का वादा निभाए और उन्हें न्याय के कठघरे में लाने में पूरा सहयोग दे।
माना जा रहा है कि जब तक यह प्रक्रिया कोई ठोस आकार नहीं पाती दोनों देशों के उच्चपदस्थ अधिकारी और एनएसए किसी तीसरे देश में भेंट-मुलाकात का विकल्प अपनाएंगे और विशेष मुद्दे पर ही चर्चा होगी। हालांकि अब्दुल बासित का वक्तव्य सामने आने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने शांति वार्ता के बाबत सफाई दी है। लेकिन विदेश मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि शांति वार्ता प्रक्रिया में अभी सहयोगात्मक रुख बढ़ाकर कदम-दर-कदम दोनों देश आगे बढ़ेंगे। रहा सवाल विदेश सचिव स्तरीय वार्ता का तो उसके ढांचे, मुद्दे, प्रक्रिया, स्थान समेत तमाम बिन्दुओं पर दोनों देशों के उच्चपदस्थ अधिकारी लगातार संपर्क में हैं।
भारत -पाक के रिश्तों में जमी बर्फ पेरिस में प्रधानमंत्री मोदी और नवाज शरीफ के बीच सहमति के बाद पिघलनी शुरू हुई थी। इसके बाद थाईलैंड में दोनों देशों के एनएसए और विदेश सचिव मिले थे। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अचानक अफगानिस्तान पर आयोजित सम्मेलन में हिस्सा लेने के बहाने पाकिस्तान का दौरा किया। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने प्रधानमंत्री मोदी को भरोसा दिया था और मोदी ने पूरी दुनिया में सकारात्मक संदेश देते हुए 25 दिसंबर 2015 को नवाज के घर जाकर चौंका दिया था। इसके बाद दोनों देशों के विदेश सचिवों की 16 जनवरी 2016 को भेंट प्रस्तावित थी, लेकिन दो जनवरी को पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर आतंकी हमले के बाद भारत ने इसे टाल दिया।