कोरोना काल में कक्षाओं के न चलने से छात्रों का काफी नुकसान हुआ है। परीक्षा परिणामों पर इसका असर न पड़े, इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर सीबीएसई ने पाठ्यक्रम में 30 फीसदी तक की कटौती कर दी है। लेकिन इस पर कई राजनीतिक दलों की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है।
वहीं, भाजपा नेता सुदेश वर्मा ने कहा है कि विपक्ष को हर चीज को राजनीतिक नजरिये से नहीं देखना चाहिए। आपात स्थिति को देखते हुए यह परिवर्तन केवल एक वर्ष के लिए किया गया है। इस समय विपक्ष को देश को आगे बढ़ाने पर सकारात्मक सहयोग देना चाहिए और उसे छात्रों के विषय पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेकुलरिज्म इस देश के रक्त में है और जब इस तरह के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाए जाते थे तब भी यह देश सेकुलर था और आगे भी रहेगा।
लेडी इरविन कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन की विभागाध्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर रेनू मालवीय ने कहा कि किसी कक्षा के किसी विषय के पाठ्यक्रम का निर्धारण सामान्य प्रक्रिया नहीं है। छात्रों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की कमेटी कई बार की बैठकों के बाद इसका स्वरूप, विषय और तरीके पर फैसला करती है। सिलेबस में कटौती इस समय की मांग है, लेकिन ऐसा करने के दौरान भी पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
एनसीईआरटी से जुड़ीं शिक्षाविद प्रीती खन्ना ने कहा कि सिलेबस कट कहने के नाम पर 30 फीसदी हुआ है, लेकिन ज्यादातर मामलों में कहा जा रहा है कि असाइनमेंट और कुछ एक्टिविटीज के जरिए इसे पूरा कर दिया जाएगा। इसके आलावा, इकोनॉमिक्स, माइक्रोइकोनॉमिक्स जैसे तकनीकी विषयों में विषयवस्तु की कमी का असर छात्रों को भविष्य में नुकसान के रूप में देखना पड़ सकता है।