तुर्किये में आए भीषण भूकंप के बाद एनडीआरएफ ने 'ऑपरेशन दोस्त' शुरू किया था। राहत एवं बचाव कार्य के दौरान, एनडीआरएफ दल और वहां के लोगों के बीच आत्मीयता का रिश्ता बन गया। डिप्टी कमांडेंट दीपक, शुद्ध 'शाकाहारी' थे। उनकी टीम ने स्थानीय निवासी 'अहमद' के परिवार के तीन सदस्यों को बचाया था। अहमद को जब पता चला कि दीपक शाकाहारी हैं, तो वह रोजाना कई किलोमीटर दूर उस साइट पर पहुंचता, जहां एनडीआरएफ दल राहत-बचाव कार्य में लगा था। उसकी आंखों में आंसू होते, मगर वह दीपक को कभी सेब तो कभी टमाटर दे जाता। दूसरी ओर, टूआईसी वीएन पराशर, जो एनडीआरएफ दल का हिस्सा थे, जब वे स्वदेश लौटने लगे तो स्थानीय लोगों ने भावुक होकर कहा, आप लोगों ने हमारी बहुत बड़ी मदद की है। हम चाहते हैं कि ये 'याद' सदा बनी रहे। उन्होंने अपने मूल्यवान बैज एवं प्रतीक चिन्ह, पराशर को दे दिए। टूआईसी वीएन पराशर ने भी अपने कुछ बैज उनके हाथों पर रख दिए।
सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 'ऑपरेशन दोस्त' में शामिल एनडीआरएफ टीमों की खूब सराहना की थी। मंगलवार को नेशनल मीडिया सेंटर में एनडीआरएफ की टीमों का मीडिया से परिचय कराया गया। टीम के सदस्यों ने तुर्किये के नूरदागी और अंताक्या में राहत एवं बचाव कार्य किया था। डिप्टी कमांडेंट दीपक बताते हैं कि उन्हें परिवारिक दायित्व के चलते शाकाहारी रहना था। वे जिस जगह पर थे, वहां खाने का कोई तय समय नहीं था। हालांकि कैंप में खाना बनता था, लेकिन उसे साइट तक पहुंचने में समय लग जाता था। ड्यूटी भी 14-15 घंटे या उससे ज्यादा की होती थी। वहां पर अहमद नाम के एक व्यक्ति थे। भूकंप की चपेट में उसके परिवार के कई सदस्य आ गए थे। एनडीआरएफ ने उसके परिवार के तीन लोगों को बचाया था।
किसी ने उन्हें बताया कि दीपक तो शाकाहारी हैं, वे यहां का लोकल फूड नहीं खा रहे। अब यहीं से एक भावनात्मक रिश्ते की कहानी शुरु होती है। अगले ही दिन से अहमद, उसी साइट पर आने लगा, जहां दीपक की टीम राहत बचाव कार्य में लगी थी। बतौर दीपक, वह मुझे रोजाना फल या सब्जी दे जाता। कभी टमाटर तो कभी सेब ले आता था। जब वह साइट पर आता तो उसकी आंखों में आंसू होते थे। वे उसकी जुबान को बयां कर रहे थे। वे दिल को छू लेने वाले भाव थे। ऐसे भाव, जो सदा हमारे साथ रहेंगे।
दूसरी कहानी भी भावुक कर देने वाली है। सेकेंड इन कमांड, वीएन पराशर और उनके दल ने वहां पर अनेक लोगों को बचाया। कई बार ऐसा भी हुआ कि साइट से सीधे ही लोग उनके पास पहुंच गए। वे मदद की गुहार लगाते। आप हमारे साथ चलिए, फलां जगह पर आदमी फंसे हैं। आवाज आ रही है। एनडीआरएफ का दल उन लोगों के साथ चला जाता। उनकी हर तरह से संभव मदद की जाती। भारतीय टीम जब स्वदेश लौटने लगी तो उन लोगों का भाव देखने लायक था।
बतौर वीएन पराशर, उन लोगों ने कहा, एनडीआरएफ ने हमारी बहुत मदद की है। वे कभी इस भुला नहीं सकेंगे। हमारा और आपका एक अनोखा रिश्ता बन गया है। हम चाहते हैं कि ये रिश्ता सदैव बना रहे। हमारे जेहन में आप लोगों की यादें ताजा रहें। इतना कहते ही उन्होंने यादगार के तौर पर अपनी मूल्यवान वस्तुएं उन्हें सौंप दीं। इनमें कई तरह के बैज और प्रतीक चिह्न शामिल थे। उनकी आंखें भर आई थीं। पराशर ने भी उन्हें अपनी ओर से कुछ यादगार वस्तुएं प्रदान कीं। चूंकि टीम के साथ हर समय ट्रांसलेटर होना, संभव नहीं था। ऐसे में मोबाइल फोन पर एसएमएस या व्हाट्सएप पर लिखकर बात होती थी। गूगल ट्रांसलेट के जरिए दोनों तरफ से मैसेज का आदान प्रदान होने लगा। इससे बातों को समझने में सहूलियत हो गई। उन लोगों ने 'आभार' के कई मैसेज भी भेजे।