केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 ए प्रावधान को रद्द करने के बाद इसके तहत मामले दर्ज को बंद करना राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्राथमिक कर्तव्य है।
केंद्र ने शीर्ष अदालत में हलफनामा दर्ज कर कहा है कि हालांकि 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पत्र लिखकर शीर्ष अदालत द्वारा 2015 में रद्द किए गए इस कानून के फैसले के अनुपालन की सूचना दी है।
राज्य सरकारों के तहत कानून का पालन करने वाली एजेंसियों को सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि आईटी एक्ट की धारा-66ए के तहत कोई नया मामला दर्ज न हो।
हलफनामे में कहा गया है कि पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था भारत के संविधान के अनुसार राज्य के विषय हैं और अपराधों का पता लगाकर इसकी रोकथाम, जांच व अभियोजन और पुलिस कर्मियों की क्षमता निर्माण मुख्य रूप से राज्यों की जिम्मेदारी है।
केंद्र सरकार ने यह हलफनामा गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) पीयूसीएल की उस याचिका पर दिया है, जिसमें यह कहा गया है कि धारा-66ए को निरस्त किए जाने के बावजूद इसके तहत मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पांच जुलाई को कहा था कि यह चौंकाने वाला, परेशान करने वाला, भयानक और आश्चर्यजनक स्थिति है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 ए का इस्तेमाल अब भी नागरिकों के आपत्तिजनक ऑनलाइन पोस्ट के लिए उनके खिलाफ किया जा रहा है जबकि वर्ष 2015 में श्रेया सिंघल मामले में धारा-66ए को निरस्त कर दिया गया था।
निरस्त किए जाने के वक्त इस कानून के तहत 11 राज्यों में 229 मामले लंबित थे। लेकिन इसके बाद भी इन राज्यों में इस प्रावधान के तहत 1307 नए मुकदमे दर्ज किए गए।