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Online Voting: ऑनलाइन खरीदारी कर सकते हैं तो ऑनलाइन वोटिंग क्यों नहीं? समझिए Digital Election की राह में मुश्किलें क्या हैं?

प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 06 Jan 2022 01:22 PM IST

सार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपनी ओर से चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वह कोरोना के खतरे को देखते हुए ऑनलाइन वोटिंग कराए। अक्सर युवा वोटर्स भी पूछते हैं कि क्या ऐसा कोई एप नहीं है जहां मैं बिना कतार में लगे या समय खर्च किए आसानी से वोट कर सकूं? पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी बताते हैं कि Online Voting या Digital Elections  के लिए वो क्या चुनौतियां हैं जो वास्तविकता में इसे जमीन पर नहीं उतरने देती और क्यों इसकी सुरक्षा और वैधता पर सवाल है?
 
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आधार से जुड़ेगी मतदाता सूची - फोटो : सोशल मीडिया
कोरोना की तीसरी लहर का खतरा अब बिल्कुल सिर पर है, इस बीच चुनाव आयोग किसी भी समय यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा कर सकता है। चुनावों की घोषणा को लेकर आयोग ने मंगलवार को भी इस मुद्दे पर बैठक की थी और बुधवार को भी दिन भर बैठकों का दौर चला था। इधर कांग्रेस ने बरेली में लड़कियों की मैराथन में मची भगदड़ के बाद उत्तर प्रदेश में चुनावी रैलियों और भीड़भाड़ वाले तमाम कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। वहीं पीएम नरेंद्र मोदी की लखनऊ में होने वाली और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की नोएडा में होने वाली रैली भी रद्द कर दी गई है।

समाजवादी पार्टी की शुक्रवार से शुरू होने वाली गोंडा और अयोध्या की ‘विजय रथयात्रा’ भी स्थगित कर दी गयी है। दरअसल भीड़ भरे कार्यक्रमों और रैली में हजारों की संख्या में लोगों के जुटने के कारण राजनेताओं की आलोचना हो रही थी और राजनीतिक पार्टियों से ऐसी रैलियों को रोकने की अपील की जा रही थी, क्योंकि रैलियों में जुटने वाली भीड़ को कोरोना संक्रमण बढ़ाने में बड़ी भूमिका मानी जा रही है।  


ऑनलाइन वोटिंग का उत्तराखंड हाईकोर्ट का सुझाव
इस बीच कोरोना के बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए बुधवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को अपनी ओर से सलाह दिया है कि वह बड़ी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करे। इसके अलावा हाईकोर्ट ने ऑनलाइन वोटिंग कराने का भी सुझाव चुनाव आयोग को दिया है। कोरोना की पहली लहर के बाद नवंबर 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार ने कहा था कि इस बार बिहार का चुनाव प्रचार डिजिटल ज्यादा होगा और अगर चुनाव आयोग ने इजाजत दी तो वोटिंग भी ऑनलाइन करवाई जाएगी। कहा जाता है कि ऑनलाइन मतदान तेज और विश्वसनीय नतीजे दे सकता है। इससे मतदान प्रतिशत भी बढ़ सकता है।
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आधार से जुड़ेगी मतदाता सूची - फोटो : सोशल मीडिया
कोरोना की तीसरी लहर का खतरा अब बिल्कुल सिर पर है, इस बीच चुनाव आयोग किसी भी समय यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा कर सकता है। चुनावों की घोषणा को लेकर आयोग ने मंगलवार को भी इस मुद्दे पर बैठक की थी और बुधवार को भी दिन भर बैठकों का दौर चला था। इधर कांग्रेस ने बरेली में लड़कियों की मैराथन में मची भगदड़ के बाद उत्तर प्रदेश में चुनावी रैलियों और भीड़भाड़ वाले तमाम कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। वहीं पीएम नरेंद्र मोदी की लखनऊ में होने वाली और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की नोएडा में होने वाली रैली भी रद्द कर दी गई है।

समाजवादी पार्टी की शुक्रवार से शुरू होने वाली गोंडा और अयोध्या की ‘विजय रथयात्रा’ भी स्थगित कर दी गयी है। दरअसल भीड़ भरे कार्यक्रमों और रैली में हजारों की संख्या में लोगों के जुटने के कारण राजनेताओं की आलोचना हो रही थी और राजनीतिक पार्टियों से ऐसी रैलियों को रोकने की अपील की जा रही थी, क्योंकि रैलियों में जुटने वाली भीड़ को कोरोना संक्रमण बढ़ाने में बड़ी भूमिका मानी जा रही है।  

ऑनलाइन वोटिंग का उत्तराखंड हाईकोर्ट का सुझाव
इस बीच कोरोना के बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए बुधवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को अपनी ओर से सलाह दिया है कि वह बड़ी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करे। इसके अलावा हाईकोर्ट ने ऑनलाइन वोटिंग कराने का भी सुझाव चुनाव आयोग को दिया है। कोरोना की पहली लहर के बाद नवंबर 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार ने कहा था कि इस बार बिहार का चुनाव प्रचार डिजिटल ज्यादा होगा और अगर चुनाव आयोग ने इजाजत दी तो वोटिंग भी ऑनलाइन करवाई जाएगी। कहा जाता है कि ऑनलाइन मतदान तेज और विश्वसनीय नतीजे दे सकता है। इससे मतदान प्रतिशत भी बढ़ सकता है।

मतदाता जागरुकता के लिए बनाई मानव श्रृंखला - फोटो : अमर उजाला
ऐसे में यह सवाल जरुर उठता है कि जब डिजिटल इंडिया बनाने की बात की जा रही है और हमारे पास उन्नत तकनीक है तो ऑनलाइन वोटिंग या डिजिटल चुनाव क्यों नहीं कराए जा सकते? कहा जाता है कि इससे लोगों की भीड़ जुटाए बिना और संक्रमण के खतरे से बचते हुए आसानी से चुनाव कराए जा सकते हैं। 

यह समझने के लिए आखिर चुनाव आयोग ऑनलाइन वोटिंग और ऑनलाइन चुनाव कराने के विकल्प के बारे में क्यों नहीं सोचता है, हमने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी से बात की। उन्होंने कुछ कारणों पर प्रकाश डाला।

1. चुनाव सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती
एस वाई कुरैशी कहते हैं,  Digital Election सुरक्षित नहीं है। उनके मुताबिक ऑनलाइन वोटिंग के कथित तौर पर कई लाभ हैं, लेकिन साइबर सुरक्षा जोखिम, इन लाभों से कहीं अधिक है। निष्पक्ष चुनावों की सुरक्षा के लिए जोखिम नहीं उठाए जा सकते, क्योंकि इसके बहुत से संवेदनशील मुद्दे हैं। 

ऑनलाइन काम - फोटो : istock
2: इंटरनेट वोटिंग से साइबर सुरक्षा जोखिम बढ़ता है
इंटरनेट से वोटिंग में साइबर सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। डिजिटली मतदान एक साइबर अपराधियों और साइबर आतंकियों  को हमला करने का एक मौका दे सकता है। उनका उद्देश्य प्रणाली को अक्षम करना, मतदाताओं को मतपत्र डालने से रोकना और चुनाव में मतदाता विश्वास को कम करना हो सकता है, जो सुरक्षा जोखिमों में एक है।

3: कोई भी कंप्यूटर या सिस्टम 100 फीसदी ‘Unhackable’ नहीं
एस वाई कुरैशी का मानना है कि ऑनलाइन वोटिंग के लिए कंप्यूटर सिस्टम और एप्लिकेशन की जरुरत होगी जिसमें बग और त्रुटियां हो सकती है जिनका लाभ उठाया जा सकता है। चुनाव की सुरक्षा के लिहाज से यह भी एक जटिल मुद्दा है कि कोई भी कंप्यूटर या सिस्टम ऐसा नहीं है जिसे हैक नहीं किया जा सकता। हैकर मतपत्रों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं।

ऑनलाइन - फोटो : pexels.com
4-मतदान को गुप्त रखने की चुनौती भी बड़ी 
मतदाता किसे वोट डालता है यह उसकी पसंद का विषय है। इसलिए मतदान को गुप्त रखा जाता है और यह एक निजी  प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन डिजिटल चुनाव होने से मतदान को गुप्त रखने की चुनौती भी बढ़ जाएगी। यदि हैकर सिस्टम हैक कर लेता है तो यदि वह यह बात सार्वजनिक कर देता है कि किस व्यक्ति ने किस उम्मीदवार या किस पार्टी को वोट दिए हैं तो इससे मतदाता का नाम और उसकी पहचान सार्वजनिक हो जाएगी और इससे उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

5-सबके लिए इंटरनेट की उपलब्धता पर सवाल
इंटरनेट का विस्तार अब लगभग पूर देश में हो गया है, लेकिन इसकी अच्छी बैंडविड्थ और भरोसेमंद सेवा अभी भी हर जगह उपलब्ध नहीं है। भले ही कई इलाकों में इंटरनेट पंहुच चुका है, लेकिन फिर भी आबादी के एक बड़े तबके के पास अभी भी  इंटरनेट की सुविधा नहीं है। बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस के दौरान यह समस्या देश भर में देखी गई। विशेषज्ञों की राय है कि अगर ऑनलाइन वोटिंग शुरू होती है तो उसका लाभ देश के कम से कम 20 फीसदी लोग ही उठा पाएंगे, जो लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकती। 
 

ऑनलाइन - फोटो : फाइल फोटो
कई देशों में हो रही ऑनलाइन वोटिंग
यूरोप के देश एस्टोनिया में ऑनलाइन वोटिंग 2005 में ही शुरू कर दी गई थी। सबसे पहले इसका इस्तेमाल स्थानीय चुनावों में हुआ था। फिर 2007 में संसदीय चुनाव में भी ऑनलाइन वोटिंग ही हुई।

ऑस्ट्रेलिया में भी ऑनलाइन वोटिंग का इस्तेमाल होता है। आईवोट नाम के सिस्टेम से सिर्फ न्यू साउथ वेल्स में यह सुविधा है, लेकिन 2015 में इस पर एक विवाद पैदा हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि 66 हजार ई-वोट में फर्जीवाड़ा किया गया। दावा था कि थर्ड पार्टी ने वेबसाइट को हैक कर लिया था। इंग्लैंड में 2007 के निकाय चुनावों में वोट डालने के लिए परम्परागत तरीके के अलावा ई-वोटिंग का भी सहारा लिया गया था। इसके लिए सरकार ने 65 अलग-अलग जगहों पर 300 लैपटॉप और कंप्यूटरों की व्यवस्था करवाई।

 
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