यह भी सामने आया कि फेसबुक रिक्वेस्ट स्वीकार होने के बाद मैसेंजर पर फेक नाम वाली युवती आ जाती है। वह ग्राहक से पहले उसका व्हाट्सअप नंबर मांगती है। व्हाट्स नंबर देने का अर्थ है कि अब इस गिरोह के पंजे में फंसने की शुुरुआत हो चुकी है। फेसबुक पर महिलाओं के नाम की कई फर्जी प्रोफाइल मौजूद हैं।
इसी में से एक ने विनय दुबे को भी मैसेंजर से व्हाट्स नंबर लेकर कॉल किया। वह बताते हैं कि काल में आवाज एक लड़की की थी। थोड़ी ही देर में विनय लड़की के प्रभाव में आ गए। इसके बाद उसने वीडियो कॉल की और इस वीडियों कॉल में वह न्यूड होती गई। अपनी इस प्रक्रिया के दौरान उसने विनय से भी वर्चुअली आगे बढने के लिए कहा। थोड़ा-सा आगे बढ़ते ही फोन कॉल डिस्कनेक्ट हो गया और ब्लैकमेलिंग का धंधा शुरू हो गया।
विनय दुबे के साथ यह घटना 22 अप्रैल 2021 को हुई थी। विनय बताते हैं कि वीडियो कॉल की घटना के दो दिन बाद उनके पास एक नंबर से फोन आया। बताने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस साइबर सेल का एसआई बताया और उनके व्हाट्सअप पर रिकार्डेड वीडियो भेजकर जांच में सहयोग करने की अपील शुरू कर दी।
साइबर सेल का जांच अधिकारी बना शख्स विनय को अश्लील कारोबार समेत तमाम अनैतिक गतिविधि में शामिल होने का आरोप लगाकर दबाव बनाता है। दूसरी तरफ एक अन्य नंबर से किसी और नाम के आदमी ने यूट्यूब पर वीडियो लोड करने की धमकी देकर पैसे मांगने शुरू कर दिए। बात यहीं खत्म नहीं हुई। विनय को कॉल करने वाली युवती ने पुलिस में न जाने, गूगल फोन पे के जरिए 15,000 हजार रुपये तुरंत देने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। फेसबुक पर लोग प्रोफाइल में परिवार की फोटो या परिचय डाल देते हैं। इस गिरोह ने ऐसे फोटो अपलोड करके उसे वीडियो के साथ जोड़ रखा है। यह विनय दुबे को परेशान करने के लिए काफी था। लिहाजा अपराधियों ने अब तक हजारों वसूल लिए हैं।
पिछले एक सप्ताह में इसकी पड़ताल में कई सच सामने आए। यवतमाल से एसआई धीरेन्द्र राजपूत ऐसी ही एक पड़ताल के सिलसिले में फोन पर आए। बताते हैं कि अपराधी किस्म के लोग गरीब मजदूरों, रिक्शा वालों या ऐसे लोगों से उनके मोबाइल का सिम कुछ पैसे का लालच देकर लेते हैं। यह सिम स्मार्ट और बेसिक फोन के सहारे लोगों की ब्लैकमेलिंग के काम आती है।
कॉल करने के लिए अपराधियों ने व्हाट्सअप को बड़ा जरिया बना रखा है। फेसबुक उनके लिए काफी मददगार हो रहा है। दिल्ली पुलिस के एसआई कल्याण पाटिल कहते हैं कि कई मोबाइल नंबर तो इस तरह के मिल रहे हैं, जिनके असली मालिक का पता ही नहीं चल पाता। हालांकि देर-सबेर उस सिम का इस्तेमाल करने वाले पकड़ लिए जाते हैं। लेकिन इसके लिए साइबर सेल को काफी पापड़ बेलना पड़ता है।
दिल्ली पुलिस साइबर सेल के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि एक मामले को सुलझाने में अमूमन तीन-चार महीने तक लग जाते हैं। तब तक ऐसे अपराधी 100 से अधिक केस कर चुके होते हैं। सूत्र का कहना है कि देश में पनप रही यह बहुत बड़ी बीमारी है।