दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा (57) का हैदराबाद में निधन हो गया। अब उनकी मौत को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। एक गैर सरकारी संगठन नेशनल प्लेटफार्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड ने दावा किया है कि लंबे समय तक कारावास और अपर्याप्त चिकित्सा देखभाल के कारण साईबाबा की बीमारियां बढ़ गईं थी। जिसके चलते उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। बता दें कि इस साल मार्च में बॉम्बे हाईकोर्ट ने साईबाबा को माओवादी संबंधों को लेकर यूएपीए मामले में आरोप मुक्त कर दिया था। इसके पहले उन्होंने 10 वर्षों तक जेल में रहे।
एनजीओ ने कहा कि कैद के दौरान साईबाबा को रीढ़ की हड्डी और तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों से जूझना पड़ा। इतना ही नहीं गिरफ्तारी के दौरान लगी चोटों के कारण उनके एक हाथ ने भी काम करना बंद कर दिया था। इसके अलावा, वे गॉल ब्लेडर की पथरी से भी पीड़ित थे। एनजीओ ने दावा किया कि उन्होंने कई बार सर्जरी के लिए अनुरोध किया था, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।
साईबाबा पिछले 20 दिनों से हैदराबाद के निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (निम्स) में भर्ती थे। माओवादी संपर्क मामले में बरी होने के सात महीने बाद शनिवार को साईबाबा की सरकारी अस्पताल में मृत्यु हो गई। साईबाबा ने बीते अगस्त में आरोप लगाया था कि शरीर का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाने के बावजूद जेल अधिकारी उन्हें नौ महीने तक अस्पताल नहीं ले गए और उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल में सिर्फ दर्द निवारक दवाएं दी गईं, जहां वह गिरफ्तारी के बाद से बंद थे। इसके चलते उनकी स्थिति और बिगड़ गई।
साईबाबा ने 2014 में किया था दावा
2014 में पूर्व अंग्रेजी प्रोफेसर ने दावा किया था कि उनकी आवाज को दबाने के लिए पुलिस ने पहले तो उनका अपहरण किया और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आंध्र प्रदेश के मूल निवासी साईबाबा ने कहा था कि उन्हें अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने माओवादियों से संपर्क खत्म नहीं किया तो उन्हें किसी झूठे मामले में गिरफ्तार कर लिया जाएगा। साईबाबा कई बीमारियों से जूझ रहे थे। साईबाबा डीयू के राम लाल आनंद कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। महाराष्ट्र पुलिस ने संदिग्ध माओवादी संबंधों में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें 2014 में कॉलेज ने निलंबित कर दिया था।