केंद्र में 'भरोसा' घट रहा है। यहां बैठे लोग हर चीज को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। इससे लोकतंत्र में आत्मविश्वास हिल गया है। एक पार्टी पहले बंगाल हारती है, उसके बाद मर्जी से बाहर का व्यक्ति असम के सीएम की कुर्सी पर बैठाना पड़ता है। ये सब मनमर्जी का खेल ही तो है। 1975 में यूपी के सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा को इंदिरा गांधी के साथ तीन-पांच होने की वजह से पद छोड़ना पड़ा। उसी साल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अब्दुल गफूर खान को बिहार के सीएम पद से हटाकर जगन्नाथ मिश्रा को मुख्यमंत्री बना दिया था। लोकतंत्र में ताकत नीचे से ऊपर जाने का नियम है, मगर उस वक्त वह पावर ऊपर से नीचे आना शुरू हो गई। मौजूदा समय में तो कहा जा रहा है कि पावर 'दो' के आसपास ही घूमती है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भले ही इस ताकत से खुश है, लेकिन इससे पार्टी का अंदरूनी स्वास्थ्य खराब हो रहा है। इसके दूरगामी खराब परिणाम देखने को मिलेंगे।
इस सवाल के जवाब में कि ऐसे में जनता की सोच क्या रहती है, डॉ. कुमार ने कहा, जनता को इससे ज्यादा मतलब नहीं होता। उसे मूलभूत सुविधाएं, जॉब और कानून व्यवस्था पटरी पर रहे, चाहिए होती हैं। आम लोग जानते हैं कि राजनीतिक जमात में बड़ी घटना होती रहती हैं। जब तक हाईकमान खुश है, कुर्सी बनी रहेगी। नीचे की परिस्थितियां चाहे जो भी रहें। नेता को कुर्सी चाहिए तो पीएम की कठपुतली बनना स्वीकार कर लेते हैं। हर बात पीएम के नाम पर होती है। जिले में अपराध बढ़ा है तो कहते हैं फलां पीएम के राज में ये सब हो रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर कुछ भी बोलते रहें, लेकिन किसान आंदोलन वाले यही कहते हैं कि मोदी नहीं चाहते उनकी मांग पूरी हो। कृषि मंत्री की कोई सुनता ही नहीं। वाजपेयी मॉडल से सरकार दूर जा रही है। इंदिरा और मोदी में समानताएं नजर आ रही हैं। सीएम, भले ही कितना अच्छा काम करता हो, लेकिन वह आपको पसंद नहीं है तो उसे जाना होगा। ये स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सारे फैसले एक या दो व्यक्ति लेंगे तो लोकतंत्र के बचने की गुंजाइश कम ही बचेगी।