भूटान एक ऐसा देश है जिससे चीन का राजनीतिक संबंध नहीं के बराबर है। लेकिन अब भारतीय चीनी राजदूत लुओ झाउहु मंगलवार से थिम्पू के दौरे पर हैं। चीन और भूटान के बीच बढ़ते राजनीतिक संबंध भारत के लिए परेशानी खड़े कर सकते हैं, वहीं थिम्पू की नई सरकार चीन के साथ रिश्ते को सुधारने में लगी है जिससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिल सके।
भूटान की नई सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री लोटे तशरीर कर रहे हैं और इनकी पार्टी ड्रुक न्यमरुप त्सोग्पा (डीएनटी) है। इनकी पार्टी चाहती है कि पहाड़ी इलाकों में भारत के तरफ से निर्यात होने वाले जलविधुत को कम किया जाए। जबकि डीएनटी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि भारत के साथ भूटान का व्यापारिक संबंध पूरे व्यापार का 80 प्रतिशत है।
भारत का भूटान एक ऐसा पड़ोसी देश है जो बेल्ट एंड रोड इनिशटिव ( बीआरआई) में शामिल नहीं है। बता दें कि बीआरआई चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है और यह यूरोप, एशिया के साथ अफ्रीका के भी कुछ हिस्से से होकर गुजरेगी। इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजर रहा है जिसपर भारत ने ऐतराज जताया है। वहीं बीआरआई से चीन की अर्थव्यवस्था को और रफ्तार मिलेगी।
पिछले महीने भूटान के प्रधानमंत्री लोटे तशरीर ने भारत का दौरा किया था। तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूटान को संक्रमणकालीन व्यापार सहायता सुविधा के लिए चार सौ करोड़ अगले पांच साल में देने का वादा किया था। तशरीर ने मोदी को भूटान आने का न्योता भी दिया था जिसपर अभी तक कोई फौसला नहीं हो पाया है।
दरअसल, 73 दिनों तक भारत और चीन के सैनिक डोकलाम में डटे रहे। भारत ने डोकलाम में चीन की एक नहीं चलने दी और आखिरकार चीन को सीमा से हटना पड़ा। वहीं लुओ का कहना था कि डोकलाम के बाद से भारत और चीन के रिश्ते बेहतरीन दौर से गुजर रहे हैं, जिससे दोनों देशों को फायदा होगा।