पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ वकील ई. एम. एस. नचियाप्पन ने संसद की एक समिति से कहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि इसके लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में बदलाव काफी होगा। सूत्रों ने यह जानकारी दी।
'मौजूदा कार्यकाल में ही लागू होना चाहिए प्रस्ताव'
नचियाप्पन कांग्रेस से पूर्व सांसद और 'कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय' पर बनी स्थायी समिति के भी अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने पहले भी एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की थी। अब उन्होंने 'एक देश-एक चुनाव' विधेयक की जांच कर रही समिति से कहा कि सरकार को इस प्रस्ताव को अपने मौजूदा कार्यकाल में ही लागू करना चाहिए। अगर इसके अगली लोकसभा के लिए छोड़ दिया गया तो यह कानूनी रूप से संदिग्ध हो सकता है।
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संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए नचियाप्पन
वह शुक्रवार को संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए, जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद पी.पी चौधरी कर रहे हैं। इस दौरान संविधान संशोधन विधेयक के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए,जो एक साथ चुनाव कराने की पेशकश करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, नचियाप्पन ने विधायी जनादेश की समयसीमा का हवाला देते हुए उस प्रावधान पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया है कि विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति एक सार्वजनिक अधिसूचना जारी कर सकती हैं और यह अधिसूचना लोकसभा के पहले सत्र की तारीख को लागू मानी जाएगी।
'संविधान में एक साथ या चरणबद्ध चुनावों का जिक्र नहीं'
नचियाप्पन ने तर्क दिया कि नवनिर्वाचित लोकसभा जनता की नई इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसे पिछली लोकसभा के फैसलों को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने समिति से कहा कि संविधान में कहीं भी एक साथ या चरणबद्ध चुनावों का जिक्र नहीं है, इसलिए इसे संशोधित करने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, संविधान ने चुनावों से जुड़ी सभी जिम्मेदारियों को चुनाव आयोग को सौंपा है।
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जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव का दिया सुझाव
उन्होंने सुझाव दिया कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 14 और 15 में संशोधन करके चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह न केवल विधानसभा भंग होने से छह महीने पहले चुनावों की घोषणा कर सके, जैसा कि अभी होता है, बल्कि भंग होने के कुछ महीनों बाद भी चुनाव कराने का अधिकार मिले। इससे विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तारीखें मिलाई जा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना एक बार में संभव नहीं है, लेकिन यह प्रक्रिया धीरे-धीरे कुछ चुनावी चक्रों के जरिए हासिल की जा सकती है। सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ वकील ने यह भी बताया कि भाजपा और उसके सहयोगी दल करीब दो-तिहाई राज्यों में सत्ता में हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर यह गठबंधन लोकसभा के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराने के लिए सहमत हो जाए, तो एक साथ चुनाव की दिशा में यह एक बड़ा कदम हो सकता है।