चोपड़ा ने बताया कि सुनवाई के दौरान पांच सदस्यीय पीठ ने भी हमें सेबियत के अधिकार पर यह कहते हुए दलीलें पेश करने से रोक दिया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान उसके इस अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राम मंदिर तो महत्वपूण ही है राम-काज भी उतना ही महत्वपूर्ण है और राम-काज की जिम्मेदारी निर्मोही अखाड़े के पास थी।
साथ ही अखाड़े को यह बात भी गले नहीं उतर रही है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान ने उसकेबाद सूट दायर किया था लेकिन लिमिटेशन केआधार पर सिर्फ उसकेसूट को खारिज कर दिया गया, जो हमारी समझ से परे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर वर्षों से अखाड़े की मौजूदगी और उसकी भूमिका को ही ध्यान में रखते हुए ही अपने विशेषाधिकार(अनुच्छेद-142 के तहत) केंद्र सरकार द्वारा बनाए जाने वाले ट्रस्ट द्वारा स्कीम बनाते वक्त निर्मोही अखाड़े को प्रबंधन में उचित भूमिका प्रदान करने के लिए कहा है। चोपड़ा ने कहा कि अब देखने वाली बात होगी कि सरकार द्वारा उन्हें क्या भूमिका दी जाती है।
चोपड़ा ने बताया कि अखाड़े केवकील फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अध्य्यन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अखाड़े के पास कानूनी विकल्प मौजूद है और जल्द ही इस पर विचार किया जाएगा कि पुनर्विचार याचिका दायर की जाए या नहीं?