पीएम नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता को उनके आलोचक भी काबिल-ए-तारीफ मानते हैं। सोशल मीडिया पर मौजूदगी के मामले में उन्हें कुछ सबसे बड़े वैश्विक राजनेताओं की सूची में रखा जा सकता है।
जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में मार्च के पहले सप्ताह में यह घोषणा की थी कि वह सोशल मीडिया अकाउंट्स को छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं, तो लोग हैरान रह गए थे। लोगों को इस बात पर हैरानी इसलिए हुई क्योंकि वे सोशल मीडिया का सबसे बेहतर इस्तेमाल करने वाले और सोशल मीडिया पर देश के सबसे 'मुखर' शीर्ष नेता रहे हैं।
पीएम की आलोचना करने वाले भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने और अपने पहले एक साल के कार्यकाल में ही उन्होंने युवाओं को जोड़ने, कार्यकर्ताओं तक संदेश पहुंचाने, विभिन्न अभियानों में लोगों को शामिल करने और विदेश यात्राओं के लिए सोशल मीडिया का इस तरह से धुंआधार इस्तेमाल किया कि विपक्ष के दूसरे नेता पटखनी खा गए।
युवाओं की पसंद को पहले भांप लिया था
दरअसल मोदी और उनकी टीम ने यह बहुत पहले भांप लिया था कि पहली बार वोट देने जा रहा युवा सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल करता है और उस वर्ग तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया को ही औजार बनाना होगा। युवाओं तक पहुंचने के लिए शुरू की गई यह रणनीति धीरे-धीरे समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने के लिए आजमाई गई और कामयाब रही। भाजपा नेता कहते हैं मोदी ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके जिस तरह से विश्व में लोकप्रियता के शिखर को छूआ कि दूसरे नेताओं भी उनके अनुसरण के लिए मजबूर होना पड़ा।
मोदी के सोशल मीडिया प्रेम की बानगी हर जगह दिखती है। चाहे वो चुनाव प्रचार हो या वोटिंग सेल्फी, सरकारी अभियान हों या विदेशी दौरे, उन्होंने सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया। इसी वजह से न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी को 'सोशल मीडिया पोलिटिशियन' कहा था। कहा यह भी जाता है कि मोदी ने दुनिया में शुरू हुए सेल्फी के नए ट्रेंड को भारत में भी लोकप्रिय कर दिया।
मोदी के सत्ता में 20 साल-सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल करते हैं पीएम
- फोटो : Amar Ujala
पीएम नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता को उनके आलोचक भी काबिल-ए-तारीफ मानते हैं। सोशल मीडिया पर मौजूदगी के मामले में उन्हें कुछ सबसे बड़े वैश्विक राजनेताओं की सूची में रखा जा सकता है।
जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में मार्च के पहले सप्ताह में यह घोषणा की थी कि वह सोशल मीडिया अकाउंट्स को छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं, तो लोग हैरान रह गए थे। लोगों को इस बात पर हैरानी इसलिए हुई क्योंकि वे सोशल मीडिया का सबसे बेहतर इस्तेमाल करने वाले और सोशल मीडिया पर देश के सबसे 'मुखर' शीर्ष नेता रहे हैं।
पीएम की आलोचना करने वाले भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने और अपने पहले एक साल के कार्यकाल में ही उन्होंने युवाओं को जोड़ने, कार्यकर्ताओं तक संदेश पहुंचाने, विभिन्न अभियानों में लोगों को शामिल करने और विदेश यात्राओं के लिए सोशल मीडिया का इस तरह से धुंआधार इस्तेमाल किया कि विपक्ष के दूसरे नेता पटखनी खा गए।
युवाओं की पसंद को पहले भांप लिया था
दरअसल मोदी और उनकी टीम ने यह बहुत पहले भांप लिया था कि पहली बार वोट देने जा रहा युवा सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल करता है और उस वर्ग तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया को ही औजार बनाना होगा। युवाओं तक पहुंचने के लिए शुरू की गई यह रणनीति धीरे-धीरे समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने के लिए आजमाई गई और कामयाब रही। भाजपा नेता कहते हैं मोदी ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके जिस तरह से विश्व में लोकप्रियता के शिखर को छूआ कि दूसरे नेताओं भी उनके अनुसरण के लिए मजबूर होना पड़ा।
मोदी के सोशल मीडिया प्रेम की बानगी हर जगह दिखती है। चाहे वो चुनाव प्रचार हो या वोटिंग सेल्फी, सरकारी अभियान हों या विदेशी दौरे, उन्होंने सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया। इसी वजह से न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी को 'सोशल मीडिया पोलिटिशियन' कहा था। कहा यह भी जाता है कि मोदी ने दुनिया में शुरू हुए सेल्फी के नए ट्रेंड को भारत में भी लोकप्रिय कर दिया।
फिल्मी सितारों की पीएम मोदी के साथ सेल्फी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सोशल मीडिया पर गढ़ी अपनी छवि
राजनीति के जानकार कहते हैं कि पीएम मोदी ने सत्ता में आने के लिए सोशल मीडिया का रणनीतिक इस्तेमाल बेहतर तरीके से किया है। वास्तव में, वह देश के पहले प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने पिछले सात सालों में अपनी छवि को सावधानीपूर्वक विकसित करने और राजनीतिक बहस पर हावी होने के लिए अपनी ऑनलाइन शक्ति का प्रभावी ढंग से उपयोग किया है।
जमाने से आगे रहते हैं मोदी
गुजरात की राजनीति की बेहतरीन पकड़ रखने वाले और नरेंद्र मोदी को लंबे समय तक कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार धीमंत पुरोहित बताते हैं कि यह मोदी की कामयाबी है कि वे चाहे संघ के संगठन में रहें हों या सीएम रहें या अब पीएम हैं, वे हमेशा अपने जमाने से आगे रहते हैं। मैं उन्हें तब से जानता हूं जब वे संगठन मंत्री थे। उस समय डिजिटल डायरी नई-नई आई थी और मोदी उसका इस्तेमाल करते थे। जब फोन आया तब भी वे कार्यकर्ताओं से कहते थे कि फोन सिर्फ बात करने के लिए नहीं है, डिजिटल दुनिया में जाओ तब पता चलेगा कि इसका इस्तेमाल किस तरह कर सकते हैं।
पुरोहित कहते हैं कि पीएम मोदी बहुत पहले से न केवल खुद तकनीक का इस्तेमाल करते थे बल्कि कार्यकर्ताओं को भी इसके लिए तैयार करते थे। मोदी देश के राजनेताओं में पहले राजनेता थे जिन्होंने तकनीक और सोशल मीडिया की अहमियत समझी और इसका इस्तेमाल शुरू किया।
दूसरे नेताओं से आगे निकले
नरेंद्र मोदी से लेकर अब तक के तमाम प्रधानमंत्रियों के ऊपर हाल में ही एक नई किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री-देश दशा और दिशा’ आई है। इस किताब के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि मोदी बहुत जल्दी सोशल मीडिया की ताकत को समझ गए थे। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत दूसरी पार्टियों ने बहुत देर से इसकी अहमियत समझी, लेकिन तब तक पीएम मोदी सोशल मीडिया पर बहुत आगे निकल गए।
किवदवई कहते हैं उन्होंने बहुत सावधानी से सोशल मीडिया पर अपनी छवि गढ़ी और अपनी जगह स्थापित कर ली। मोदी सोशल मीडिया का इस्तेमाल 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले से कर रहे हैं। अलग-अलग भाषाओं में उनकी टीम दिन-रात इसके लिए काम करती है।
पीएम मोदी ट्विटर:
- फोटो : twitter
सोशल मीडिया रणनीति कैसे शुरू हुई
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मिशिगन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंफॉर्मेशन के एक एसोसिएट प्रोफेसर, जोयोजीत पाल ने अपने एक अध्ययन में यह पाया है कि मोदी 2012 में जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब फेसबुक और ट्विटर पर उनका उदय हुआ।
2013 की शुरुआत तक, उनकी सोशल मीडिया पर मौजूदगी ज्यादा नहीं थी। फेसबुक पर बस कुछ पोस्ट लिखे हुए थे, जिसमें लोगों से 'नमो लीग' में शामिल होने की अपील की गई थी। यह अभिनेता अजय देवगन के साथ एक गूगल हैंगआउट सेशन था जिसे यूट्यूब पर भी प्रसारित किया गया था।
सोशल मीडिया पर मोदी का राष्ट्रीय अवतार
पाल ने ‘बनैलिटीज टर्न्ड वायरल: नरेंद्र मोदी एंड द पॉलिटिकल ट्वीट’ के अपने 2015 के अध्ययन में लिखा मोदी की ऑनलाइन उपस्थिति में परिवर्तन 2013 में शुरू हुआ। साल की शुरुआत में, उनके ट्वीट के फोकस में गुजरात था। फिर जून के दूसरे सप्ताह में, मोदी ने तत्कालीन भाजपा संसदीय नेता एल के आडवाणी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से आशीर्वाद मांगने वाले कई ट्वीट किए। इन ट्वीट्स के पीछे भाजपा की आंतरिक चर्चा की स्पष्ट झलक मिल रही थी कि 2014 के राष्ट्रीय चुनाव अभियान का नेतृत्व कौन करेगा। यह सोशल मीडिया पर मोदी का राष्ट्रीय अवतार था।
अध्ययन में कहा गया है इस समय तक उनके ट्वीट का अनुवाद करने के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में ट्विटर अकाउंट बन चुके थे। उनके सोशल मीडिया अभियान में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया की विशेषज्ञ टीम गठित की गई जिसमें देश के जाने माने तकनीकी और सोशल मीडिया एक्सपर्ट शामिल हुए।
सूत्रों के मुताबिक उनकी टीम का मकसद प्रत्येक ट्वीट और पोस्ट के जरिए देश के सबसे बड़े नेता के रूप में मोदी के कद को ऊंचा करना था गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, वह अक्सर मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ गुस्से में ट्वीट करते थे। उदाहरण के लिए, जब 2013 में रुपये की कीमत गिर रही थी, तब उन्होंने ट्वीट किया, "यूपीए सरकार और रुपया एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं कि कौन अधिक गिरेगा।
राहुल गांधी का ट्विटर प्रोफाइल
- फोटो : ट्विटर
सोशल मीडिया पर ऐसे बढ़ने लगा मोदी का कद
चार जुलाई 2013 को, उन्होंने शशि थरूर को ट्विटर पर देश के सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले राजनेता के रूप में पछाड़ दिया। 17 सितंबर, 2013 को मोदी का जन्मदिन सोशल मीडिया पर एक महत्वपूर्ण अभियान बना। यहीं से भाजपा का प्रसिद्ध 'आईटी सेल' तेजी से आगे। मोदी के हैंडल @narendramodi ट्विटर अकाउंट पर तेजी से फॉलोवर्स बढ़ने लगे।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि यहीं से मोदी ने लगभग हमेशा सभी राजनीतिक बहसों और मुद्दों के केंद्र में खुद को आगे रखा, क्योंकि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से भारत के अगले प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। जब उन्हें भाजपा के प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया तो मोदी को चाहने वालों में उनके प्रति दीवानगी बढ़ने लगी थी। रातों रात सैकड़ों लोगों ने नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगाते हुए अपने ट्विटर प्रोफाइल को बदल दिया। एक पूर्व सरकारी अधिकारी का कहना है "दुनिया में शायद कहीं भी कोई नेता इतना सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं है, जितने कि मोदी हैं।
कांग्रेस ने पहल सोशल मीडिया की ताकत को कम आंका
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सोशल मीडिया और तकनीक के हथियार से लैस होकर पार्टी को जीत की ओर बढ़ाया। जबकि देश की सबसे पुरानी पार्टी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया की ताकत को कम आंक रही थी।
रशीद किदवई बताते हैं ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस से जुड़े रहे एक पुराने साथी ने जब राहुल गांधी को ट्विटर के इस्तेमाल के लिए कहा तो राहुल गांधी ने इसको कम आंका और उन्होंने कहा था मुद्दों की लड़ाई सोशल मीडिया पर नहीं जमीन पर लड़ी जाती है। तब कांग्रेस ने इसकी अहमियत कम आंकी और पार्टी ने 2017-18 में सोशल मीडिया की ताकत को समझा।
आज वही राहुल गांधी ट्विटर पॉलिटिक्स करते हैं और अपनी बात सबसे पहले ट्विटर पर ही रखते हैं। ट्विटर और फेसबुक समेत तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर राहुल गांधी के फॉलोवर्स भी बढ़े हैं। कांग्रेस का मानना है कि भाजपा ने राहुल गांधी की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया और आज भाजपा को सोशल मीडिया के इसी खेल में हराने का एक साधन बन गया है।
नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा
कहां से आया आइडिया?
बताया जाता है कि अपने कामकाज और उपलब्धियों के प्रचार के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल का आइडिया पीएम मोदी को बराक ओबामा के चुनाव अभियान को देखकर आया था। मोदी ने अमेरिकी चुनाव को करीब से देखा और पाया कि वहां नेता अपने प्रचार के लिए सोशल मीडिया का न केवल इस्तेमाल करते हैं बल्कि उस पर खूब सक्रिय रहते हैं। लोगों तक इस सस्ते प्रचार माध्यम के जरिए अपनी बात पहुंचाने का तरीका उन्हें ज्यादा कारगर लगा और पीएम भी ट्विटर और फेसबुक के जरिए मतदाताओं तक सीधी पहुंचने की रणनीति पर काम करने लगे।
वरिष्ठ पत्रकार धीमंत पुरोहित बताते हैं कि बड़े नेताओं को उनके जन्मदिन पर या पुण्यतिथि पर याद करने का चलन मोदी ने शुरू किया है जिसके बाद बाकी नेता भी ऐसा करने लगे। दरअसल मोदी इसे पॉलिटकल टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में वे लीड करते हैं और बाकी दूसरे नेता उनको फॉलो करते हैं। सोशल मीडिया के नशे को परखने वाले पहले नेता मोदी थे। इसके जरिए मोदी यंग इंडिया से जुड़ने की कोशिश करते हैं। इसलिए फॉलोवर्स के मामले में भी मोदी दुनिया के शीर्ष के नेताओं में अपनी जगह बनाए रखते हैं।
पेशेवर टीम संभालती है सोशल मीडिया
अभी नरेंद मोदी ट्विटर हैंडल पर उनके 71.7 मिलियन और इंस्टाग्राम पर 60.9 मिलियन फॉलोवर्स हैं। पीएम मोदी के सोशल मीडिया अकांउट्स को संभालने के लिए पेशेवरों की एक टीम काम करती है। जानकारी के मुताबिक प्रत्येक ट्वीट और पोस्ट की सावधानीपूर्वक योजना बनाई जाती है। आधिकारिक तौर पर "मंजूरी" दिए जाने से पहले प्रत्येक प्रधान मंत्री के ट्वीट की एक से अधिक व्यक्ति जांच करते हैं। पीएम के ट्वीट को तुरंत लाइक और रीट्वीट करने के लिए एक बहुत सुव्यवस्थित प्रणाली है। जैसे ही कोई वीडियो डाला जाता है उसे तुरंत साझा किया जाता है।" मोदी की टीम कम से कम समय में किसी चीज को वायरल करना जानती है।
देहरादून में चौकीदार कार्यक्रम (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
विपक्ष पर वार करने के और अपने चुनाव अभियान को धार देने के लिए इस सिस्टम का परीक्षण मार्च 2019 को लोकसभा चुनाव से कुछ हफ्ते पहले किया गया था, जब प्रधानमंत्री ने इस पर #MainBhiChowkidar अभियान शुरू किया, मिनटों के भीतर भाजपा के नेता और कार्यकर्ताओं ने अपने व्यक्तिगत ट्विटर पर इस्तेमाल होने वाले नाम को बदलकर "चौकीदार नरेंद्र मोदी" कर दिया।
एक अन्य ट्वीट में, मोदी ने अपने निजी फेसबुक और ट्विटर पेजों पर तीन मिनट का एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें उन्होंने अपने समर्थकों से "मैं भी चौकीदार" प्रतिज्ञा लेने का आग्रह किया। वीडियो नमो ऐप पर भी उपलब्ध कराया गया, जिसके लगभग 1.5 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हैं। यह वही समय था जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया था।
चौकीदार अभियान तुरंत वायरल हो गया
मिली जानकारी के मुताबिक चौकीदार” अभियान को पीएमओ में सोशल मीडिया टीम ने डिजाइन किया गया था और गुरुग्राम स्थित एबीएम कंपनी ने इसे बनाया था। 2014 में मोदी अभियान के लिए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपने इवेंट मैनेजमेंट कौशल ने "चाय पे चर्चा" जैसी नवीन अवधारणा लेकर आए थे तो 2019 में एबीएम के "चौकीदार" अभियान भी खूब सफल रहा। आधा दर्जन "मैं भी चौकीदार" वीडियो और एक थीम गीत टीवी और सोशल मीडिया के लिए जारी किया गया था। उनका "चौकीदार" अभियान लगभग तुरंत वायरल हो गया।
बालाकोट के बाद राष्ट्रवादी ट्वीट्स
मोदी के आलोचक कहते हैं कि मोदी जनमिजाज को तुरंत भाप लेते हैं और मौके के हिसाब से सोशल मीडिया पर उनकी रणनीति भी बदल जाती है। उदाहरण के लिए 14 फरवरी 2019 को, पुलवामा आतंकी हमला हुआ तो तुरंत मोदी की सोशल मीडिया टीम का राजनीतिक एजेंडा भ्रष्टाचार से राष्ट्रीय सुरक्षा में बदल गया। एक पखवाड़े के भीतर, बालाकोट के बाद उनकी सोशल मीडिया टीम ने उन्हें राष्ट्रीय हितों के बहादुर चौकीदार के रूप में पेश कर दिया।
नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा।
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मीडिया रिपोर्ट्रस के मुताबिक 2019 के चुनाव में राजनेताओं के ट्विटर के इस्तेमाल पर एनआरआई प्रोफेसर के नेतृत्व में एक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के मुताबिक 2019 के संसदीय चुनाव में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शहरी मध्य वर्ग को आकर्षित करने और अपने पार्टी कैडर को उत्साहित करने के लिए राष्ट्रवाद से भरे ट्वीट किए। यह अध्ययन हाल ही में अमेरिका में इंटरनेशनल कम्युनिकेशन रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुई है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि मोदी ने अपने अधिकांश ट्वीट (41 प्रतिशत) का इस्तेमाल देश भर में भाजपा की चुनावी रैलियों और कार्यक्रमों के बारे में बात करने के लिए किया, जबकि उनके 17 प्रतिशत ट्वीट उनके राजनीतिक विरोधियों, मुख्य रूप से विपक्षी पार्टी कांग्रेस को लेकर थी। वहीं लगभग 13 प्रतिशत ट्वीट्स में पाकिस्तान में आतंकी शिविरों के खिलाफ भारतीय हवाई हमलों को लेकर राष्ट्रवाद का उल्लेख था।
2019 का चुनाव व्हाट्सएप पर लड़ा गया
मोदी के 2014 और 2019 के सोशल मीडिया अभियानों के बीच एक खास अंतर देखा गया। इंटरनेट- मोबाइल यूजर बढ़ने और तकनीक के और विकसित होने से उनका संदेश अब और तेजी से पहुंच रहा है। 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा आईटी सेल और सोशल मीडिया सेल के संयोजक अमित मालवीय ने अपने एक बयान में कहा था "यह भारत का पहला सही मायने में सोशल मीडिया से संचालित चुनाव था जो टीवी स्टूडियो की तुलना में बहुत अधिक तीव्रता के साथ व्हाट्सएप पर लड़ा गया।"
हर मंत्री और भाजपा नेता को सोशल मीडिया पर उतारा
मोदी ने सोशल मीडिया की ताकत समझी तो उन्होंने भाजपा के प्रत्येक वरिष्ठ नेता और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को भी सोशल मीडिया पर उतार दिया। सूत्रों के मुताबिक मंत्रियों और भाजपा नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहें। मंत्रियों और भाजपा नेताओं के पोस्ट की पीएमओ सावधानीपूर्वक निगरानी करता है।
जानकारी के मुताबिक अधिकांश कैबिनेट मंत्रियों के अपने कार्यालयों में अपनी सोशल मीडिया टीम है और उनके निजी सहायक व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से एक-दूसरे के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं। ट्वीट और वीडियो तुरंत अपलोड और शेयर किया जाता है। भाजपा की आईटी और सोशल मीडिया टीम ने देश भर में पार्टी कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के लिए सोशल मीडिया कार्यशालाओं का आयोजन करके उन्हें इसके इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया है। पार्टी का दावा है कि प्रत्येक बूथ समिति में, कम से कम पांच ऐसे लोग हैं जो तकनीक-प्रेमी हैं और स्मार्टफोन से लैस हैं।