फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Nalanda: वो विश्वविद्यालय, जिसने दुनिया बदली, बख्तियार खिलजी की एक सनक की भेंट चढ़ी सदियों की विरासत

Wed, 19 Jun 2024 01:43 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा

सार

नालंदा विश्वविद्यालय में साहित्य, खगोलशास्त्र, मनोविज्ञान, कानून, विज्ञान, दर्शनशास्त्र, गणित, अर्थशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद, योग जैसे विषयों की पढ़ाई कराई जाती थी। चीन के ह्वेनसांग और इतसिंग जैसे विद्वानों ने भी भारत आने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय का गुणगान किया था।
विज्ञापन
नालंदा विश्वविद्यालय - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आज पूरी दुनिया के छात्र पढ़ाई के लिए ब्रिटेन और अमेरिका जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा था, जब पूरी दुनिया से छात्र ज्ञान पाने भारत आते थे। लंदन की प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी 500 से भी ज्यादा वर्षों पहले भारत के बिहार में मौजूद नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान पाने का सिरमौर संस्थान था। नालंदा विश्वविद्यालय एक समय 90 लाख किताबों का घर था और दुनियाभर से करीब 10 हजार छात्र नालंदा में पढ़ने आते थे। आज नालंदा विश्वविद्यालय फिर से चर्चा में है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन किया है। 455 एकड़ में फैले नए परिसर में कुल 221 संरचनाएं हैं। मशहूर आर्किटेक्ट बीबी जोशी ने नालंदा विश्वविद्यालय के प्रारूप को डिजाइन किया है। साल 2014 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय के निर्माण की नींव रखी थी। नई शुरुआत के साथ इस विख्यात विश्वविद्यालय के स्वर्णिम इतिहास पर भी नजर डालते हैं।
विज्ञापन


दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था नालंदा
दुनिया के सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक रहा नालंदा विश्वविद्यालय आज लाल ईंटों का खंडहर बनकर रह गया है, जो अपने पुराने वैभव की राह तक रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी पहल कर दी है। नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है। इसकी स्थापना पांचवीं शताब्दी में गुप्त वंश के सम्राट कुमार गुप्त ने कराई थी। बाद में नालंदा विश्वविद्यालय को सम्राट हर्षवर्धन और पाल वंश के शासकों से संरक्षण मिलता रहा। यहां देश-दुनिया के 10 हजार छात्र-विद्वान यहां रहकर ज्ञान प्राप्त करते थे।

नालंदा की लाइब्रेरी में थीं 90 लाख किताबें
नालंदा विश्वविद्यालय में साहित्य, खगोलशास्त्र, मनोविज्ञान, कानून, विज्ञान, दर्शनशास्त्र, गणित, अर्थशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद, योग जैसे विषयों की पढ़ाई कराई जाती थी। चीन के ह्वेनसांग और इतसिंग जैसे विद्वानों ने भी भारत आने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय का गुणगान किया था और इसे विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय करार दिया था। नालंदा विश्वविद्यालय स्थापत्यकला का भी अद्भुत नमूना है। यहां 300 से ज्यादा कमरे थे और सात बड़े हॉल थे। नालंदा में नौ मंजिला लाइब्रेरी थी और माना जाता है कि इस लाइब्रेरी में 90 लाख से ज्यादा किताबें मौजूद थीं। 
विज्ञापन


नालंदा में प्रवेश पाना बेहद कठिन था। यहां पढ़ाई के इच्छुक छात्रों को नालंदा के शीर्ष प्रोफेसरों के साथ मुश्किल मौखिक साक्षात्कार में शामिल होना पड़ता था और अपने ज्ञान का प्रमाण देना पड़ता था। जो लोग भाग्यशाली रहे, उन्हें भारत के प्रतिष्ठित विद्वानों और बौद्ध गुरुओं जैसे धर्मपाल और सीलभद्र आदि द्वारा पढ़ाया गया। पुस्तकालय की 90 लाख हस्तलिखित, ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियाँ दुनिया में बौद्ध ज्ञान का सबसे समृद्ध भंडार थीं। उन ताड़ के पत्तों की पुस्तकों और चित्रित लकड़ी के पन्नों में से केवल मुट्ठी भर ही आग से बच पाए, जिन्हें भागते हुए भिक्षुओं ने अपने साथ ले लिया था। एक बार दलाई लामा ने भी कहा था कि 'हमारे पास जो भी ज्ञान है, उसका स्त्रोत नालंदा से आया है।'

दुनिया बदलने में नालंदा की भूमिका
भारतीय गणित के जनक माने जाने वाले आर्यभट्ट के बारे में अनुमान लगाया जाता है कि उन्होंने छठी शताब्दी ईस्वी में विश्वविद्यालय का नेतृत्व किया था। आर्यभट्ट ने ही दुनिया को शून्य से परिचित कराया और शून्य को अंक के रूप में मान्यता दी, जो एक क्रांतिकारी अवधारणा थी। इस शून्य ने गणितीय गणनाओं को सरल बनाया और बीजगणित जैसे अधिक जटिल विषयों को विकसित करने में मदद की। शून्य के बिना, हमारे पास कंप्यूटर नहीं होते। यही वजह है कि दुनिया को बदलने में नालंदा की भूमिका बेहद अहम रही। आर्यभट्ट की खोज ने ही दक्षिण भारत और पूरे अरब प्रायद्वीप में गणित और खगोल विज्ञान के विकास बढ़ावा दिया। बौद्ध शिक्षाओं और दर्शन को पूरे एशिया में फैलाने में भी नालंदा की अहम भूमिका रही। 

एक सनक ने तबाह की विरासत
1190 के दशक में तुर्क-अफगान सैन्य जनरल बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में आक्रमणकारियों की एक लुटेरी टुकड़ी ने विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था। इतिहासकार बताते हैं कि एक समय बख्तियार खिलजी बहुत बीमार पड़ा। उसके हकीमों ने बख्तियार का बहुत उपचार किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। किसी ने बख्तियार खिलजी को नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से इलाज कराने की सलाह दी। जिसके बाद आचार्य राहुल श्रीभद्रजी को बुलाया गया तो बख्तियार खिलजी ने उनके सामने एक अजीब शर्त रख दी कि वह उनके द्वारा दी जाने वाली किसी आयुर्वेदिक दवाई को नहीं खाएगा। आचार्य ने भी खिलजी की शर्त मान ली और उसे बस कुरान पढ़ने की सलाह दी।

बताया जाता है कि कुरान पढ़ने के बाद वो ठीक हो गया। कहा जाता है कि आचार्य राहुल श्रीभद्रजी ने कुरान के पन्नों पर दवा का लेप लगाया था, जिससे दवा खिलजी के हाथों में लगती और जब वह पन्ने पलटने के लिए अपनी ऊंगली जीभ पर लगाता तो दवाई उसके मुंह में चली जाती। इस तरह बख्तियार खिलजी ठीक हो गया। जब बख्तियार खिलजी को इसका पता चला तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि भारतीय विद्वान उसके हकीमों से भी ज्यादा ज्ञानी हैं। माना जाता है कि खिलजी को लगने लगा कि नालंदा से मिल रहीं शिक्षाएं इस्लाम से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इसलिए उसने नालंदा विश्वविद्यालय परिसर में आग लगा दी। ऐसा भी माना जाता है कि नालंदा के समय बौद्ध धर्म और उसकी शिक्षाएं तेजी से फैल रहीं थी, ऐसे में बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए उसने नालंदा में आग लगाई।  

नालंदा के अवशेष अब यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थली में शामिल हैं। हर साल बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक ज्ञान के केंद्र के अवशेषों को देखने आते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर इतना विशाल था और यहां इतनी किताबें थी कि हमलावरों द्वारा लगाई गई आग तीन महीने तक जलती रही थी। इस आग ने न सिर्फ शिक्षा के केंद्र को जलाया बल्कि सदियों के ज्ञान और विरासत को भी तबाह कर दिया। 
विज्ञापन


 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें