नगालैंड विधानसभा में मंगलवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया। इस प्रस्ताव के तहत नगालैंड को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता से छूट देने की मांग की गई है। मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने कहा कि 'नगालैंड सरकार और नगा लोगों का मानना है कि समान नागरिक संहिता राज्य को लोगों की परंपराओं, सामाजिक प्रथाओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए चुनौती पेश करेगा। ऐसे में राज्य में यूसीसी लागू करना खतरनाक हो सकता है।'
नगालैंड सरकार ने कहा विशेष है राज्य का इतिहास
नगालैंड विधानसभा के स्पीकर ने सरकार को प्रस्ताव लाने की मंजूरी दी। इसके बाद स्पीकर ने प्रस्ताव को विधानसभा के पटल पर रखा, जिसे सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। नगालैंड सरकार ने एक कैबिनेट फैसले के तहत अपने विचार आयोग के सामने रखे और समान नागरिक संहिता के विरोध का आधार बताया। नगालैंड सरकार ने बताया कि राज्य का इतिहास अलग है। आजादी से पहले ब्रिटिश काल में भी हमारे सामाजिक और धार्मिक मामलों में किसी का दखल नहीं था और आजादी के बाद भी यह बरकरार रहा। संविधान के अनुच्छेद 371ए के तहत नगालैंड के लिए विशेष प्रावधान किए गए।
क्या है अनुच्छेद 371ए
अनुच्छेद 371ए के तहत संसद का धार्मिक और सामाजिक विषयों से जुड़ा कोई भी कानून नगालैंड पर लागू नहीं होगा। भूमि और उसके संसाधनों का स्वामित्व और हस्तांतरण राज्य पर लागू होगा लेकिन विधानसभा से इसकी मंजूरी जरूरी होगी।
विधि आयोग ने मांगे हैं विचार
राज्य सरकार ने बताया कि उन्होंने एक सितंबर को यूसीसी (समान नागरिक संहिता) के मुद्दे पर विभिन्न जनजातीय संगठनों और सामाजिक संगठनों के लोगों से बात की और उन्होंने समान नागरिक संहिता का विरोध किया। बता दें कि केंद्र सरकार ने 21 फरवरी 2020 को विधि आयोग का गठन किया था और इसका कार्यकाल 31 अगस्त 2024 तक बढ़ा दिया गया है। विधि आयोग ने 14 जून 2023 को एक नोटिस जारी कर यूसीसी के मुद्दे पर सभी हितधारकों के विचार मांगे हैं।