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इलाहाबाद की रेखा बनी महाराष्ट्र की वीरांगना, 10वीं की पुस्तक में मिली जगह

Fri, 15 Jun 2018 04:11 PM IST
सुरेन्द्र मिश्र, अमर उजाला, मुंबई
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मध्य रेलवे सुरक्षा बल में कार्यरत एक महिला सब इंस्पेक्टर ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिससे उत्तर प्रदेश की बेटियों को गर्व होगा। महिला सब इंस्पेक्टर का नाम है रेखा मिश्रा। वह मूल रूप से इलाहाबाद की है। रेखा ने 950 से ज्यादा बिछुड़े बच्चो को उनके परिजनो से मिलाने का अनोखा काम किया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों पुरस्कृत हो चुकी रेखा की कहानी अब महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के 10वीं के छात्र पढ़ेंगे।

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950 बिछुड़े बच्चों को परिजनों से मिलवाया

रेखा मिश्रा ने साल 2015 में आरपीएफ ज्वाईन किया था। लखनऊ में ट्रेनिंग हुई और सीधे मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसटी) पोस्टिंग हो गई। ड्यूटी के दौरान ही उन्होंने घर से भागकर मुंबई आए 953 बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया। इसमें करीब 250 बच्चे उत्तर प्रदेश के थे। रेखा ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि मायानगरी की चकाचौंध और अन्य कारणों से बच्चे अपने घर से भागकर मुंबई आ जाते हैं लेकिन, उन्हें इसका एहसास नहीं होता कि यहां उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
   
रेखा ने एक अनुभाव साझा करते हुए बताया कि यूपी के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल स्थित एक किसान की लड़की फिल्मों में काम के लिए मुंबई आ गई थी। वह 10वीं में पढ़ती थी। दिखने में सुंदर थी। उसे किसी ने बताया कि उसे फिल्मों में काम मिल सकता है और वह अपने पैरों पर खड़े होकर माता-पिता की गरीबी दूर कर सकती है। लेकिन, जब वह सीएसटी स्टेशन पर पहुंची तो कुछ लोगों के बहकावे में आ गई। हालांकि वह बार-बार स्टेशन परिसर से बाहर जाती थी लेकिन, फिर वापस आ जाती थी। इसी दौरान उस पर रेखा की नजर पड़ी और उसे अपने पास बुलाया। 
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रेखा ने अपनापन दिखाया तो उसने सच बता दिया कि वह घर से क्यों भागकर मुंबई आई। इसके बाद उसे रेखा ने उसे एनजीओ के माध्यम से चाईल्ड वेल्फेयर सेंटर पहुंचाया और फिर उसके परिजन को फोन कर मुंबई बुलाया। बच्ची को पाकर परिजन खुशी से फूले नहीं समाए। रेखा ने अपने पैसे से उस लड़की और परिजन का टिकट निकलवाया और रास्ते का खर्च देकर यहां से रवाना किया। हालांकि रेखा की ड्यूटी महज 8 घंटे की है लेकिन, उन्होंने 10 घंटे से ज्यादा काम किया। एक बात तो ऐसी नौबत आ गई कि एक बिछुड़े बच्चें को उसके परिजन से मिलाने के लिए रेखा ने लगातार 48 घंटे ड्यूटी की।

यूं हुई बिछड़े बच्चों को परिजनों से मिलाने की शुरुआत

रेखा ने दो साल पहले सीएसटी स्टेशन पर एक बच्चे को देखा जो बहुत परेशान था। पूछताछ में पता चला कि वह अपने पिता की डांट से नाराज होकर भाग आया है। साथ में अपने पिता का पर्स और एटीएम कार्ड भी लेकर आया है। रेखा ने उसे उसके परिजनों से मिलवाया और फिर यह काम रेखा की रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया। वह कहती हैं कि घर से भागे सैकड़ों बच्चों से बातचीत के बाद यह पता चला कि असंतोष, असुरक्षा, बुनियादी जरूरतें और परिजन के दबाव के चलते ज्यादातर बच्चे घर से भागते है। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो सोशल मीडिया के दोस्तों और फिल्मी सितारों से मिलने का चाहत में मुंबई पहुंच जाते हैं।

शिक्षक के बजाए की फोर्स की नौकरी को तवज्जो

रेखा मिश्रा का शिक्षक के रूप में भी चयन हुआ था लेकिन उन्होंने फोर्स की नौकरी को तवज्जो दी। रेखा के पिता सुरेन्द्र नारायण मिश्र आर्मी में थे जब कि मां गृहिणी है। उनके दादा सूर्यनारायण मिश्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह बताती हैं कि दादा के संस्कार का उन पर ज्यादा असर है। इलाहाबाद जिले के सोरांव तहसील स्थित औड़िहार ब्लाक के कंजिया गांव की मूल निवासी रेखा की बीते 12 मई को इलाहाबाद में शादी हुई है। उनके पति उन्नाव में जिला खाद्य अधिकारी हैं। रेखा को महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर से 2017 का नारी शक्ति पुरस्कार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रदान किया है। यही नहीं, रेखा फिक्की की तरफ से भी स्मार्ट पोलिसिंग पुरस्कार से नवाजी जा चुकी है।

10वीं की पाठ्यपुस्तक में वीरांगना

महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग ने रेखा मिश्रा के इस अनोखे कार्य का बेहतरीन ईनाम दिया है। शिक्षा विभाग ने 10वीं कक्षा में मराठी भाषा की पाठ्यपुस्तक में रेखा को रोल मॉडल के तौर पर वीरांगना शीर्षक के तहत शामिल किया है।

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