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मुख्यमंत्री बिहार के: बिहार के पहले दलित सीएम ने तीन बार संभाली सत्ता, पर कुल मिलाकर एक साल भी नहीं रहे पद पर

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 28 Aug 2025 12:55 PM IST

सार

'मुख्यमंत्री बिहार के' सीरीज की सातवीं कड़ी में आज बात बिहार के आठवें सीएम भोला पासवान शास्त्री की। भोला पासवान बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं। आइये जानते हैं इनके बारे में...
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बिहार के पहले दलित सीएम भोला पासवान शास्त्री। - फोटो : अमर उजाला
बिहार में विधानसभा चुनावों का इतिहास दिलचस्प रहा है। सरकार बनने और गिरने के लिहाज से जितनी उठापटक बिहार में हुई है, उतना शायद ही किसी राज्य में देखी गई हो। खासकर 1967 से 1969 के दौर में 28 महीने के अंदर एक के बाद एक सात मुख्यमंत्री बदल गए। उस दौर औसतन हर मुख्यमंत्री का कार्यकाल महज चार महीने का रहा था। 

कोई सिर्फ चार दिन का मुख्यमंत्री बन कर रह गया तो किसी का कार्यकाल महज 50 दिन का रहा। इसी दौर में एक नेता दो बार मुख्यमंत्री बना। दोनों ही बार उसका कुल कार्यकाल चार महीने का नहीं रह पाया। भोला पासवान शास्त्री वो नेता थे। शास्त्री जून 1968 और ठीक एक साल बाद जून 1969 में मुख्यमंत्री बने थे।  भोला पासवान को एक और बार बिहार के सीएम की कुर्सी मिली। लेकिन तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे कुल-मिलाकर भी एक साल तक भी इस पद पर नहीं रहे। 
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बिहार के पहले दलित सीएम भोला पासवान शास्त्री। - फोटो : अमर उजाला
बिहार में विधानसभा चुनावों का इतिहास दिलचस्प रहा है। सरकार बनने और गिरने के लिहाज से जितनी उठापटक बिहार में हुई है, उतना शायद ही किसी राज्य में देखी गई हो। खासकर 1967 से 1969 के दौर में 28 महीने के अंदर एक के बाद एक सात मुख्यमंत्री बदल गए। उस दौर औसतन हर मुख्यमंत्री का कार्यकाल महज चार महीने का रहा था। 

कोई सिर्फ चार दिन का मुख्यमंत्री बन कर रह गया तो किसी का कार्यकाल महज 50 दिन का रहा। इसी दौर में एक नेता दो बार मुख्यमंत्री बना। दोनों ही बार उसका कुल कार्यकाल चार महीने का नहीं रह पाया। भोला पासवान शास्त्री वो नेता थे। शास्त्री जून 1968 और ठीक एक साल बाद जून 1969 में मुख्यमंत्री बने थे।  भोला पासवान को एक और बार बिहार के सीएम की कुर्सी मिली। लेकिन तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे कुल-मिलाकर भी एक साल तक भी इस पद पर नहीं रहे। 

'मुख्यमंत्री बिहार के' सीरीज की सातवीं कड़ी में आज बात बिहार के आठवें सीएम भोला पासवान शास्त्री की। भोला पासवान बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं। आइये जानते हैं इनके बारे में...

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पहले भोला पासवान शास्त्री को जानें?
भोला पासवान का जन्म ब्रिटिश काल में बिहार और ओडिशा प्रांत में आने वाले बैरगाची गांव में हुआ था।। उनके पिता दरभंगा के शाही परिवार के लिए काम करते थे। हालांकि, भोला पासवान के मन में पढ़-लिखकर सामाजिक बंधनों को तोड़कर आगे निकल जाने की ललक शुरुआत से ही रही। इसी ललक ने उन्हें काशी विद्यापीठ पहुंचाया, जहां से उन्होंने संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें बैचलर्स ऑफ आर्ट की डिग्री हासिल की। चूंकि, उस वक्त संस्कृत से बीए हासिल करने वाले व्यक्ति को शास्त्री (यानी शास्त्रों को जानने वाला) कहा जाता था, इसलिए भोला पासवान के नाम के आगे भी शास्त्री जुड़ गया। 

1942 में जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन तेज था, तब भोला पासवान शास्त्री जेल भी गए। हालांकि, इसी दौर में उनकी राजनीतिक समझ को बिहार में कई नेताओं ने करीब से समझा। इसी का नतीजा था कि देश के आजाद होने के बाद जब बिहार में पहली बिना चुनाव की सरकार बनी तो भी उन्हें मंत्रिमंडल में जगह मिली और जब बिहार में चुनाव हुए, तब-तब वे लगातार सरकार में कैबिनेट मंत्री बनते रहे। 

कैसा रहा राजनीतिक जीवन?
1947 में आजादी के बाद बिहार की कमान श्रीकृष्ण सिन्हा को मिली। सिन्हा कैबिनेट में भोला पासवान शास्त्री संसदीय कार्य मंत्री बने। 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में भोला पासवान शास्त्री ने धमदाहा सह कोढ़ा सीट से चुनाव लड़ा और जीते भी। वे इसके बाद 1957 के चुनाव में उन्हें धमदाहा सीट से जीत मिली। 1962 में भोला पासवान को बनमनखी सीट से चुनाव जीते। इस दौरान वे लगातार मंत्रिमंडल में जगह बनाते रहे। 1967 में वे पूर्णिया की नई बनी कोढ़ा सीट से चुनाव लड़े और फिर जीत हासिल की। हालांकि, इस बार कांग्रेस खुद सत्ता से बाहर हो गई और भोला पासवान बन गए विपक्ष के नेता। लेकिन किस्मत को अभी उन्हें मुख्यमंत्री के पद तक ले जाना था। 

कैसे गैर-कांग्रेसी सरकारों को हटाकर सत्ता में लौटी कांग्रेस?
'मुख्यमंत्री बिहार के' की पिछली तीन कड़ियों में हमने मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा, सीएम सतीश प्रसाद सिंह और बीपी मंडल के बारे में बात की और बताया कि कैसे इन तीनों ने अलग-अलग समय पर जोड़-तोड़ के जरिए राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकारों का नेतृत्व किया। हालांकि, सतीश प्रसाद सिंह और बीपी मंडल के समय तक कांग्रेस पर्दे के पीछे से सत्ता में बैकडोर एंट्री ले चुकी थी। 

1968 आते-आते जिस कांग्रेस ने समर्थन देकर बीपी मंडल की सरकार बनवाई थी, उसी कांग्रेस में फूट पड़ गई। इसके दो धड़े बन गए। एक- पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय के नेतृत्व में और दूसरा पूर्व सीएम बिनोदानंद झा का धड़ा। नतीजतन- जब बीपी मंडल सरकार से विधानसभा में विश्वासमत साबित करने को कहा गया तो कांग्रेस के बिनोदानंद झा वाले धड़े ने सरकार के खिलाफ वोटिंग की। इस तरह बीपी मंडल अपनी सरकार का बहुमत साबित नहीं कर पाए और इस्तीफा देकर पद से हट गए।

1. कैसे पहली बार भोला पासवान शास्त्री को मिली बिहार की कमान?
यहां से कहानी शुरू होती है भोला पासवान शास्त्री की। दरअसल, जब बीपी मंडल की सरकार गिरी तो बीएन झा ने खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना शुरू किया।  इसके लिए तब बीएन झा के आवास पर कांग्रेस के 17 बगावती नेताओं की बैठक भी हुई। चूंकि आज की तरह उस वक्त दल-बदल कानून नहीं था, ऐसे में कांग्रेस के बागी नेताओं ने अपना अलग लोकतांत्रिक कांग्रेस दल (एलीसीडी) बनाने का फैसला कर लिया। हालांकि, खुद झा को मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने करीबी नेताओं का समर्थन मिलता नहीं दिखा। इस स्थिति को सुलझाने के लिए बीएन झा ने अपने करीबी भोला पासवान शास्त्री का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे कर दिया। 

बताया जाता है कि इस नाम को आगे करने के बाद बागी गुट ने भी अपना मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति जता दी। इसकी वजह यह थी कि बीपी मंडल पिछड़े समुदाय से आते थे। ऐसे में उनकी जगह किसी दलित का नाम आगे बढ़ाना एक सकारात्मक संदेश की तरह देखा जाने लगा। बागी विधायकों की शास्त्री को सीएम बनाने की कोशिश को मदद मिली कांग्रेस और बीपी मंडल के विरोध में खड़े विपक्षी नेताओं की तरफ से। इसके बाद 22 मार्च 1968 को अस्तित्व में आई मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की सरकार और 1967 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार ने एक साल के अंदर ही चौथा मुख्यमंत्री देख लिया। 

पहली बार पद से कैसे हटे शास्त्री?
बिहार में शास्त्री के नेतृत्व वाली सरकार का कार्यकाल तीन महीने ही चल पाया। वजह थी मंत्रियों की तरफ से इस्तीफे की धमकियां और रामगढ़ के राजा की तरफ से अस्वीकार्य मांगें। दरअसल, रामगढ़ के राजा की पार्टी- जन क्रांति दल (जेकेडी) ने महामाया प्रसाद सिन्हा को मनाए बिना ही भोला पासवान के बागी दल को समर्थन दिया था। रामगढ़ के राजा इस समर्थन की बदौलत अपने ऊपर जमींदारी से जुड़े केस हटवाना चाहते थे, हालांकि भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री के तौर पर इसके पक्ष में नहीं थे। ऐसे में जब रामगढ़ के राजा ने नई नवेली सरकार से समर्थन वापस लेने की बात कही तो भोला पासवान ने खुद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 95 दिन की सरकार का अंत कर दिया। उन्होंने राज्यपाल से बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर दी। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी सरकार बजट तक पारित नहीं करवा पाई थी। 

बिहार में मौजूदा समय में, जब किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं है, तब पीडब्ल्यूडी मंत्री कामख्या नारायण सिंह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुझसे ऐसी मांगें रख रहे हैं, जिन्हें जनहित में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मेरे लिए इस तरह से एक लोकतांत्रिक सरकार चलाना संभव नहीं है।"

राज्यपाल को सौंपे इस्तीफे में मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री

बताया जाता है कि कामाख्या नारायण अपनी मांगों को नहीं माने जाने की वजह से भोला पासवान से निजी तौर पर नाराज थे और उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के लिए गुपचुप तरीके से कांग्रेस और शोषित दल से भी संपर्क में थे। हालांकि, भोला पासवान ने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल करते हुए न सिर्फ कामाख्या नारायण की इन कोशिशों को नाकाम किया, बल्कि अपनी चिट्ठी से उनकी पोल-पट्टी भी खोल दी। 

2. दूसरी बार कैसे सत्ता में आए भोला पासवान शास्त्री?
भोला पासवान शास्त्री के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद बिहार में अगले आठ महीने- जून 1968 से फरवरी 1969 तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। इसके बाद फरवरी 1969 में मध्यावधि चुनाव कराए गए। हालांकि, नतीजों में फिर किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। 

1969 के चुनाव में किस दल को कितनी सीटें?

इन नतीजों के बाद कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के लिए जंग पहले की तरह ही जारी रही। इस बार एक धड़े ने आगे किया दरोगा प्रसाद राय का नाम। वहीं, दूसरे धड़े ने सरदार हरिहर सिंह को सीएम बनाने का प्रस्ताव रखा। हरिहर सिंह को डीपी राय के खिलाफ जीत मिली, लेकिन उनकी सरकार अंदरूनी उठापटक के चलते महज 116 दिन ही चल पाई। उन्होंने अंतर्कलह के बीच राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

और फिर बिहार ने देखा 12 दिन का मुख्यमंत्री
हरिहर सिंह के सरकार से हटने के बाद राज्यपाल ने विपक्ष के तत्कालीन नेता लोकतांत्रिक कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया। शास्त्री ने बिना मौका गंवाए सभी कांग्रेस विरोधी दलों को एकजुट किया। लोकतांत्रिक कांग्रेस दल की अगली सरकार के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा), प्रजातंत्र सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा), भाकपा, जनसंघ, शोषित दल के समर्थन से भोला पासवान को फिर मुख्यमंत्री चुना गया।

हालांकि, इससे पहले कि भोला पासवान मुख्यमंत्री के तौर पर कोई बड़ा फैसला ले पाते, उनका गठबंधन बिखरने लगा। महज नौ दिन बाद ही जनसंघ ने यह कहते हुए समर्थन वापस ले लिया कि किसी भी दल-बदलु को नए कैबिनेट में पद नहीं दिया जाना चाहिए। दरअसल, भोला पासवान ने अपने कैबिनेट में दो पूर्व कांग्रेसियों को भी शामिल करा लिया था। इसके खिलाफ जनसंघ के रोष के बाद पासवान ने विधानसभा में ही अपनी सरकार के इस्तीफे का एलान किया। 1 जुलाई 1969 को भोला पासवान मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। 

3. जब तीसरी बार बिहार के राजनीतिक पटल के शीर्ष पर पहुंचे भोला पासवान
बिहार में किसी दल के सरकार न बना पाने की वजह से राज्य में 4 जुलाई 1969 को राष्ट्रपति शासन का एलान कर दिया गया। यह वह दौर था, जब कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही थी और इसके दो धड़े कांग्रेस-आर (इंदिरा गांधी गुट)  और कांग्रेस-ओ (कामराज गुट) के बीच सत्ता की जंग गहराती जा रही थी। आखिरकार कांग्रेस के दो धड़ों- कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) में टूटने का असर बिहार में भी दिखा और यहां पार्टी के 50 विधायक के. कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) और 60 विधायक इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) का हिस्सा बने। 

भोला पासवान शास्त्री को आखिरी बार मुख्यमंत्री बनने का मौका इंदिरा गांधी के दौर में मिला। दरअसल, जिस पार्टी- लोकतांत्रिक कांग्रेस के दम पर भोला पासवान दो बार मुख्यमंत्री बने थे, उसे बिनोदानंद झा ने कांग्रेस से तोड़कर बनाया था। कांग्रेस के एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर टूटने के बाद बिनोदानंद झा को इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत का अंदाजा हो गया। उन्होंने अपनी लोकतांत्रिक कांग्रेस का इंदिरा की पार्टी के साथ विलय करने को मुफीद फैसला समझा। हालांकि, भोला पासवान इसके लिए राजी नहीं दिखे। लेकिन कहते हैं कि जब ताज सिर पर सजना हो तो राज को कोई रोक नहीं पाता। 

1970 में बिहार में कांग्रेस (आर) की सरकार बनी, लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चल पाई। फिर कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनीं। बताया जाता है कि इस दौर में कई विधायक अपने-अपने दलों को छोड़कर इंदिरा गांधी के साथ आने के लिए आतुर थे और कांग्रेस (आर) का हिस्सा बन रहे थे। इसका दंश बाद में कर्पूरी ठाकुर को भी झेलना पड़ा। 1971 में एक के बाद एक कर्पूरी ठाकुर की खुद की पार्टी- संसोपा से कई विधायक कांग्रेस (आर) के साथ चले गए। इतना ही नहीं संविद सरकार में संसोपा की साथी पार्टी- जनसंघ के कुछ नेताओं ने भी टूटकर इंदिरा के दल को समर्थन दे दिया। नतीजतन कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिर गई।

कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफे के ठीक बाद बिहार में कांग्रेस (आर) विधायक दल के नेता जयपाल सिंह यादव, भाकपा के विधायक दल के नेता सुनील मुखर्जी और 12 विधायकों वाली प्रसोपा विधायक दल के नेता हसीब-उर रहमान ने राज्यपाल से मुलाकात की और उनसे भोला पासवान शास्त्री को सरकार के गठन के लिए न्योता देने की मांग की। इस तरह शास्त्री बिहार में कांग्रेस (आर), भाकपा और प्रसोपा को साथ लेकर प्रोग्रेसिव विधायक दल (प्रोविद) गठबंधन बनाने में कामयाब रहे। इसके अलावा कुछ छोटी पार्टियों ने भी इस गठबंधन का साथ दिया। शास्त्री ने 2 जून 1971 को तीसरी और आखिरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भोला पासवान तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, तब वह खुद एक निर्दलीय नेता थे। इस तरह बिहार में यह पहली बार था कि एक निर्दलीय नेता मुख्यमंत्री बन गया। 

उनकी सरकार को तब कांग्रेस (आर) के 105 विधायक, भाकपा के 25 और प्रसोपा के 12 सदस्यों का सीधा समर्थन था। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय पार्टियां, जैसे- झारखंड पार्टी, एचयूआई झारखंड, शोषित दल, आदि ने उन्हें समर्थन दिया। विधानसभा में शास्त्री को कुल 176 विधायकों का समर्थन था, जो कि 312 सीटों वाले सदन में बहुमत से ज्यादा था। 

हालांकि, इस गठबंधन और भोला पासवान शास्त्री का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं चला। महज 198 दिन सत्ता में रहने के बाद पासवान ने अपनी सरकार का इस्तीफा राज्यपाल को 27 दिसंबर 1971 को सौंप दिया। उनके इस कदम की मुख्य वजह उस दौर में चल रही दल-बदल की राजनीति थी। दरअसल, कांग्रेस (आर) के साथ आए उस वक्त अधिकतर नेता वह थे, जो या तो पिछली कर्पूरी ठाकुर की सरकार में पद न मिलने से नाराज थे या कांग्रेस (ओ) की घटती ताकत के मद्देनजर आए थे। इसके अलावा कुछ छोटी पार्टियों के नेता भी भोला पासवान के नेतृत्व वाले प्रोविद गठबंधन का हिस्सा थे। यह सभी नेता अलग-अलग समय में मंत्री बनने के मौके की ताक में थे। 

इसके अलावा उस दौरान कांग्रेस (आर) के एक और बड़े नेता ललित नारायण मिश्र जबरदस्त तौर पर बिहार की राजनीति में छाए थे। उनके कई समर्थक पैसों के लेनदेन में गड़बड़ी की जांच के लिए पूर्व की संविद सरकार की तरफ से गठित 'दत्त आयोग' को भंग करने की मांग को लेकर मुख्यमंत्री शास्त्री के सामने अड़े थे। ऐसे में जब सीएम शास्त्री एलएन मिश्र के करीबी नेताओं की मांग को नहीं माना तो उन्होंने शास्त्री को सीएम पद से हटाने की आवाज उठा दी। दूसरी तरफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जो कि प्रोविद का अहम हिस्सा थी का कहना था कि अगर एलएन मिश्र की मांग के मुताबिक सीएम 'दत्ता आयोग' को हटा देती है तो वह समर्थन वापस ले लेगी।

इस ऊहापोह और वाद-विवाद की स्थिति में मुख्यमंत्री शास्त्री की सरकार शुरुआत से ही असंतुलित दिखने लगी। बताया जाता है कि भोला पासवान को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने में आखिरी कड़ी साबित हुआ कांग्रेस (आर) में ही बना दरोगा प्रसाद राय का धड़ा, जो कि मंत्रिमंडल में अपने हिसाब से कई बदलाव चाहता था। ऐसा न करने पर उनका धड़ा सीएम से समर्थन वापस लेने की धमकी देने लगा। इसी कड़ी में 15 दिसंबर 1971 को बिहार प्रदेश कांग्रेस समिति के महासचिव जगनारायण पाठक ने कांग्रेस विधायक दल की बैठक में सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांग लिया। 17 दिसंबर को कांग्रेस (आर) विधायक दल की तरफ से भोला पासवान को 25 दिसंबर तक इस्तीफा देने का समय दिया गया। साथ ही प्रोविद गठबंधन का ही अगला मुख्यमंत्री 30 दिसंबर तक चुने जाने पर चर्चा हुई। 

इन सबके बीच एक वाकया यह भी हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भोला पासवान शास्त्री को दिल्ली बुला लिया। तब निर्दलीय रहे शास्त्री दिल्ली चले भी गए और चर्चा के बाद 27 दिसंबर को बिहार लौटे। उन्होंने सीधा राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपा और इस तरह शास्त्री मुख्यमंत्री पद से हट गए। हालांकि, इंदिरा गांधी से मुलाकात के कुछ समय बाद भोला पासवान खुद कांग्रेस में शामिल हो गए। राजनीतिक गलियारों में तब चर्चा थी कि इंदिरा ने मुख्यमंत्री को केंद्र की राजनीति में लाने के लिए सीएम पद से हटने का प्रस्ताव दिया था। भोला पासवान बाद में 1972 से लेकर 1982 तक राज्यसभा के सांसद और एक छोटे से अंतराल में राज्यसभा में ही नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में भी रहे।
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