उत्तराखंड में 13 जिले हैं। इन सभी 13 जिलों से दर्जनों नदियां बह कर मैदानी इलाकों में जाती हैं। आप हैरान होंगे यह जान कर कि 13 में से 11 जिलों से होकर बहने वाली 12 प्रमुख नदियों पर छोटे और बड़े लगभग 32 से ज्यादा बांध और विद्युत परियोजनाएं बना दी गई हैं। रविवार को ग्लेशियर फटने की घटना के बाद मची तबाही से अब वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चिंतित हो गए हैं।
सम्राट सेनगुप्ता का मानना है कि जब बांध बनाए जाते हैं या विद्युत परियोजनाएं शुरू की जाती हैं तो उसके साथ मिट्टी को बांधने का काम ज्यादा जरूरी होता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी इन सारी चीजों में हमें सफलता नहीं मिल पाती है। नतीजा यह होता है कि ऐसी आपदाओं के बाद जब जल प्रलय होती है तो तबाही मचाती है। वो कहते हैं जो भी बांध या परियोजनाएं उत्तराखंड में बन रही है वह बहुत जरूरी हैं। लेकिन उनका तरीका वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं है। बहुत से काम प्रकृति के विरुद्ध किए जा रहे हैं।
हिमालय में पिघलते ग्लेशिरों पर काम करने वाले मौसम वैज्ञानिक डॉक्टर एसपी भारद्वाज कहते हैं कि जिस तरह से उत्तराखंड में प्रकृति का दोहन हो रहा है वो पूरे राज्य के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा है। डॉक्टर भारद्वाज का मानना है कि पानी से बिजली बननी ही चाहिए, लेकिन जिस तरह से बनाई जा रही है वो प्रक्रिया गलत है। टिहरी परियोजना से लेकर अभी नेपाल के साथ मिलकर बनाई जा रही पिथौरागढ़ और चंपावत में काली नदी की परियोजना भी विनाशकारी साबित हो सकती है। उनका कहना है कि इस परियोजना के लिए 148 गांव को उजाड़ा जा रहा है। टिहरी परियोजना से कितना व्यापक असर जनजीवन पर पड़ा। इसका सबको अंदाजा भी है। पानी का दबाव जमीन में हलचल करता है डॉक्टर एसपी भारद्वाज कहते हैं कि बड़े बांध को हमेशा खतरा पानी के वजन की वजह से भी होता है।
पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी कहते हैं कि जो बांध उत्तराखंड में बने हैं या बन रहे हैं। वे बांध नहीं "वॉटर बम" हैं। जोशी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अगर सरकारें इस दिशा में नहीं सुधरीं तो ये तबाही ही लाएंगे। हमें छोटे-छोटे बांध बनाने चाहिए। बड़े बांध हमेशा खतरा ही होते हैं। सरकार को चाहिए कि ऊंचाई वाले स्थानों पर या ग्लेशियर के नजदीक बनाए जाने वाले बांधों से बचना चाहिए। हिमालय को बहुत नजदीक से देखने वाले अनिल कहते हैं कि सिविल इंजीनयर बांध तो बना देंगे, लेकिन उन्हें पहले प्रकृति को समझना होगा कि बांध बनाया कहां जाए। विज्ञान और पर्यावरण के बीच सामंजस्य बनाया जाना बहुत ज़रूरी है।
इसके अलावा अन्य कुछ नदियों पर भी छोटे-छोटे डैम हैं।।
चमोली जिले की सात नदियों पर बांध बना कर परियोजनाएं चालू की गई हैं। इसके अलावा देहरादून जिले में 5 नदियों को घेरा गया है बांध के लिए। पौड़ी में 4, चंपावत में 2, अल्मोड़ा में 1, टिहरी में 2, उत्तरकाशी में 2, उधमसिंह सिंह नगर 1, श्रीनगर में 1 और पिथौरागढ़ में 1 पबांध और परियोजनाएं चल रही हैं।
उत्तराखंड में इस वक्त सभी परियोजनाओं से तकरीबन 5300 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है।