प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बृहस्पतिवार को चीन से समर्थन की अपील के बावजूद परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता पर बना गतिरोध नहीं टूटा। ताशकंद में मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बृहस्पतिवार को 50 मिनट की एक अहम मुलाकात के दौरान इस मसले पर बातचीत हुई। प्रधानमंत्री ने जिनपिंग से कहा कि वह एनएसजी में भारत की सदस्यता के आवेदन का निष्पक्ष आकलन करें। लेकिन सियोल में चल रही एनएसजी की समग्र बैठक में चीन की अगुवाई में कुछ देशों की ओर से भारत की सदस्यता का कड़ा विरोध किया गया।
48 सदस्य देशों वाले एनएसजी की बैठक के एजेंडे में भारत की सदस्यता पर चर्चा करना शामिल नहीं था। लेकिन बृहस्पतिवार को शुरुआती सत्र में ही जापान और कुछ अन्य देशों ने यह मुद्दा उठाया। इसके बाद रात के भोजन के बाद भारत के आवेदन पर चर्चा की गई। लेकिन समूह में भारत को शामिल करने पर सदस्य देशों की राय बंटी रही। समझा जाता है कि बैठक में चीन के अलावा तुर्की, ऑस्ट्रिया, ब्राजील, न्यूजीलैंड और आयरलैंड जैसे कुछ देशों ने भारत की सदस्यता का विरोध करते हुए कहा कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और ऐसे में उसे इस समूह में शामिल नहीं किया जा सकता है।
इससे यह भी साफ हो गया कि मोदी की अपील के बावजूद चीन के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि शुक्रवार को बैठक का अंतिम दिन है, इस दिन क्या फैसला होता है, इस पर सभी नजरें टिकी हुई हैं।
इससे पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने बताया कि मोदी-जिनपिंग मुलाकात के दौरान सबसे अधिक समय एनएसजी के मुद्दे पर दिया गया। हालांकि चीन की प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर स्वरूप ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘आप जानते हैं कि यह एक जटिल और नाजुक प्रक्रिया है। हम इंतजार कर रहे हैं कि सियोल से कैसी खबर आती है। इससे ज्यादा मैं कुछ और नहीं कहूंगा।’
उनकी इस प्रतिक्रिया से भी यह संकेत मिला कि जिनपिंग ने मोदी को एनएनजी सदस्यता पर समर्थन का कोई भरोसा नहीं दिया है। मोदी ने जिनपिंग से आग्रह किया था कि चीन सियोल में चल रही एनएसजी की समग्र बैठक में भारत की सदस्यता पर बन रही सर्वसम्मति में शामिल हो और अपना योगदान करे। मोदी जिनपिंग की यह मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सम्मेलन से इतर हुई। मोदी इस सम्मेलन में भाग लेने गए हैं।