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मिशन 2024: क्या कांग्रेस के साथ केजरीवाल-ममता-केसीआर को साध पाएंगे नीतीश? इनके बिना अधूरी रहेगी विपक्षी एकता

अमित शर्मा
Updated Sun, 19 Feb 2023 04:09 PM IST

सार

विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि उसके अनेक दलों के राजनीतिक हित पूरी तरह एक-दूसरे के साथ टकराते हैं, लिहाजा उन सबको एक साथ मंच पर लाना बेहद मुश्किल कार्य है। यही कारण है कि विपक्षी एकता की कोशिशें पहले भी कई बार नाकाम हो चुकी हैं, और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से जिस तरह विभिन्न विपक्षी दलों ने किनारा किया था, इस बार भी यह कोशिश आसान नहीं दिखाई पड़ती। 
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नीतीश कुमार-अरविंद केजरीवाल - फोटो : Social Media


कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी 2024 आम चुनाव को लेकर बहुत गंभीर है और वह एक बड़े अलायंस के साथ इस मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। इसके लिए राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की कन्याकुमारी में हुई शुरूआत से कश्मीर में हुए समापन तक पर विभिन्न स्तरों पर कोशिश भी की गई। कांग्रेस इस बात पर पशोपेश में है कि विपक्षी एकता का स्वरूप क्या होगा और इसका नेतृत्व किसके हाथ में होगा? हालांकि कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, एक न्यूनतम एजेंडे पर सबको साथ लेकर चुनाव बाद नेतृत्व तय करने की रणनीति अपनाने के साथ विपक्षी एकता को आकार दिया जा सकता है। 




विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि उसके अनेक दलों के राजनीतिक हित पूरी तरह एक-दूसरे के साथ टकराते हैं, लिहाजा उन सबको एक साथ मंच पर लाना बेहद मुश्किल कार्य है। यही कारण है कि विपक्षी एकता की कोशिशें पहले भी कई बार नाकाम हो चुकी हैं, और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से जिस तरह विभिन्न विपक्षी दलों ने किनारा किया था, इस बार भी यह कोशिश आसान नहीं दिखाई पड़ती। 


बिहार में वामदलों के कार्यक्रम में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की बातों का अभिप्राय यही माना जा रहा है कि वे चाहते हैं कि जिन स्थानों पर कांग्रेस भाजपा के साथ सीधी लड़ाई में है (जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, हिमाचल, गुजरात इत्यादि), वे सीटें विपक्षी खेमे की ओर से उसे सौंप दी जाएं, जबकि जिन स्थानों पर दूसरे विपक्षी दल भाजपा का ज्यादा बेहतर ढंग से मुकाबला कर रहे हैं (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और पश्चिम बंगाल), उन स्थानों से कांग्रेस स्वयं को पीछे खींच ले। इस फॉर्मूले से कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल एक दूसरे के हितों को संभालते हुए साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। 


लेकिन दूसरे दलों की बजाय कांग्रेस के अंदर ही इस फॉर्मूले को लेकर असहमति है। कांग्रेस के एक शीर्ष नेता ने अमर उजाला को बताया कि पार्टी का यह फॉर्मूला उसके लिए विनाशकारी साबित हुआ है। पार्टी ने यूपी-बिहार में गठबंधन हितों को प्राथमिकता देते हुए अपने को पीछे खींच लिया। इसका फायदा दूसरे दलों को हुआ और वे मजबूत हुए, जबकि कांग्रेस देश के इन दो बड़े राजनीतिक राज्यों से पूरी तरह गायब सी हो गई। 


भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस ने इसी तरह की रणनीति दिल्ली में अपनाई। इसका परिणाम हुआ कि अपने सबसे मजबूत गढ़ों में से एक रही दिल्ली से कांग्रेस लगभग खत्म हो गई। इसी तरह की रणनीति पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान अपनाई गई जिसमें पार्टी को जमीनी तौर पर बड़ा नुकसान हुआ। 


नेता के मुताबिक, इस प्रस्तावित गठबंधन में यदि कांग्रेस एक बार फिर समझौता करती है तो इसका अर्थ पंजाब, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को इन राज्यों में दूसरे दलों के हाथों सौंप देना होगा। इससे पार्टी इन सभी राज्यों में यूपी-बिहार की तरह कमजोर हो जाएगी जो उसकी भविष्य की राजनीति के लिए आत्मघाती होगा। लेकिन यदि कांग्रेस इन राज्यों में मजबूत रुख अपनाती है तो इन राज्यों में दूसरे मजबूत दल (आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस इत्यादि) को कांग्रेस के साथ गठबंधन में लाना मुश्किल हो जाएगा। 
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क्या नीतीश कर पाएंगे समाधान?

नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन दलों के आपस में टकराते हितों को साधते हुए एक मंच पर लाने की होगी। इसे हल कर पाना आसान नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इन सभी राज्यों में एक सोची-समझी रणनीति के अनुसार सीटों के आधार पर गठबंधन बनाकर और सभी दलों को एक सम्मानजनक संख्या में सीटें देकर एक मंच पर लाने की कोशिश की जा सकती है। पूर्व में यूपीए और एनडीए में इस तरह के गठबंधन कामयाब हुए हैं, लिहाजा एक नई रणनीति के अनुसार इसे अमल में लाया जा सकता है। 


क्या महागठबंधन संभव?

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि यह विपक्ष की खिचड़ी है जो कभी नहीं पकती। इसका बड़ा कारण है कि इन दलों के अपने राजनीतिक हित एक-दूसरे के साथ टकराते हैं। इनमें से कोई दल अपना राजनीतिक बलिदान करने के लिए तैयार नहीं होगा, लिहाजा इस तरह के गठबंधन की बात केवल जुबानी जमाखर्च से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि जनता ने दिखा दिया है कि इस तरह के अवसरवादी गठबंधन उसे किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हैं। पूर्व में उत्तर प्रदेश में इसी तरह का गठबंधन सपा-बसपा और सपा-कांग्रेस के बीच हो चुका है और इनका परिणाम शून्य रहा है। नेताओं के बीच के गठबंधन के होते हुए भी एक दल के वोट दूसरी पार्टियों को ट्रांसफर नहीं हुए, इसे देखते हुए भी महागठबंधन बनाने की कोशिश करने वाले नेताओं को सीख लेनी चाहिए। 


प्रासंगिक रहने के लिए बयानबाजी

प्रेम शुक्ला ने कहा कि नीतीश कुमार बिहार में भी तीसरे नंबर के दल हैं। वे बिहार के कब तक मुख्यमंत्री रह पाएंगे, यह तय नहीं है। बिहार की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता अब लगभग समाप्त हो चुकी है और अपने डेढ़ दशकों से ज्यादा के समय मुख्यमंत्री रहते हुए भी बिहार को विकास के पैमाने पर कहीं नहीं ले जा सके हैं। उन्होंने कहा कि अपनी खोती प्रासंगिकता को बचाने के लिए नीतीश कुमार इस तरह का सियासी शिगूफा छोड़ रहे हैं। वे स्वयं भी जानते हैं कि इस कवायद का कोई परिणाम नहीं निकलेगा।  

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