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Odisha HC: नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता का 27 सप्ताह का गर्भ किया जाएगा समाप्त, उड़ीसा हाईकोर्ट ने दिया आदेश

Tue, 04 Mar 2025 01:14 AM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कटक

सार

उड़ीसा हाईकोर्ट ने नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के 27 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय तौर पर समाप्त करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने पीड़िता की स्वास्थ्य की खतरनाक स्थिति को देखते हुए यह आदेश दिया। नाबालिग एनीमिया और मिर्गी से पीड़ित है। पिछले साल कंधमाल जिले के अनुसूचित जनजाति समुदाय की एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया था।
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ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश - फोटो : ANI
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विस्तार
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उड़ीसा हाईकोर्ट ने नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के 27 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय तौर पर समाप्त करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने पीड़िता की स्वास्थ्य की खतरनाक स्थिति को देखते हुए यह आदेश दिया। नाबालिग एनीमिया और मिर्गी से पीड़ित है। 

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पिछले साल कंधमाल जिले के अनुसूचित जनजाति समुदाय की एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया था। आरोपी ने उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। जब पीड़िता की हालत बिगड़ी तो पता चला कि वह छह सप्ताह से अधिक की गर्भवती है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत निर्धारित 24 सप्ताह से अधिक के गर्भ का समाप्त नहीं किया जा सकता है। 

मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इसके बाद जब पीड़िता की मेडिकल जांच की गई तो पता चला कि उसकी गर्भावस्था में तमाम दिक्कते हैं। इससे उसकी जान को खतरा हो सकता है। इसके बाद मामले को उड़ीसा उच्च न्यायालय में लाया गया। पीड़िता के माता-पिता ने कोर्ट से गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगी। 
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अदालत ने पिछले महीने अपने आदेश में बरहामपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल को दुष्कर्म पीड़िता की स्थिति जानने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। बोर्ड ने माना कि गर्भावस्था को पूरा करने से नाबालिग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा होगा। बोर्ड की रिपोर्ट पर राज्य सरकार ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई। सरकार ने कहा कि बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

उड़ीसा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एसके पाणिग्रही ने मामले में फैसला सुनाते हुए शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन अधिकारों के महत्व पर जोर दिया। अदालत ने ऐसे मामलों में अनावश्यक न्यायिक देरी को गलत बताया। साथ ही ऐसे मामलों के लिए त्वरित प्रक्रिया की योजना बनाने की बात कही।

हाईकोर्ट ने गर्भ समाप्ति की अनुमति देने के अलावा ओडिशा सरकार को  पीड़िता की स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने, नौकरशाही बाधाओं को कम करने और ऐसे मामलों को कुशलतापूर्वक संभालने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संवेदनशील बनाने के लिए (एसओपी) तैयार करने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि एसओपी को छह महीने के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा और लागू किया जाएगा।

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