आयुष मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री की अपील के बाद एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। इसमें टीम में आयुर्वेद के वरिष्ठ जानकारों के अलावा यूनानी और नेचुरोपैथी के वैज्ञानिकों को भी शामिल किया गया था।
जानकारी के मुताबिक, आयुष मंत्रालय के उपाय कोरोना की बीमारी के पूर्ण इलाज करने का दावा नहीं करेंगे। ये केवल सहयोगी प्रकृति के हो सकते हैं। यानी इनके लेने से संक्रमण न हो, और अगर संक्रमण हो गया है तो इलाज के दौरान स्वास्थ्य लाभ लेने में तेजी आ सके।
पश्चिमी देशों का पूरा समुदाय उन्हीं तरीकों पर विश्वास करता है जो उपाय क्लीनिकल परीक्षणों पर खरे उतरते हैं। इसे देखते हुए आयुष मंत्रालय अपने उपायों को मरीजों पर परीक्षण करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए पूरे देश में पचास केंद्रों का चयन किया जाएगा।
जो अस्पताल अपने मरीजों पर आयुर्वेद के उपायों का परीक्षण करेंगे, आयुष मंत्रालय उन्हें दस लाख रुपये (प्रत्येक को) की आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराएगा। आयुष मंत्रालय ने परीक्षणों के लिए कुछ विशेषज्ञों की सेवाएं लेने का भी निर्णय किया है। इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
सेंट्रल काउंसिल ऑफ रिसर्च इन नेचुरोपैथी एंड योगा के निदेशक डॉक्टर राघवेंद्र राव ने अमर उजाला को बताया कि पश्चिम के स्टैंडर्ड पर खरे उतरना आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा के उपायों के लिए कठिन चुनौती है।
भारत में इन उपायों को पारंपरिक तौर पर अपनाया जाता रहा है, लेकिन पश्चिम हर परिणाम को तथ्यात्मक परिमाण से परखने की कोशिश करता है। यही कारण है कि कोरोना काल में भारतीय आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा को पश्चिम में लोकप्रिय बनाने के लिए हमें और अधिक मानक परीक्षण करने होंगे।
इसके लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। उम्मीद है कि जल्दी ही इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।
डॉक्टर राघवेंद्र राव के मुताबिक भारत में कोरोना के अलग-अलग क्षेत्रों में सामने आए मामलों में 6 फीसदी से लेकर 69 फीसदी तक लोगों में संक्रमण के लक्षण दिखाई नहीं पड़े हैं। यह इसी बात का प्रमाण हो सकता है कि भारतीय समाज में लोग अपने भोज्य पदार्थों में जड़ी-बूटियों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं।