प्लास्टिक प्रदूषण के महीन कण (माइक्रोप्लास्टिक) भोजन, पानी यहां तक की जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसमें तक घुल चुके हैं। यह हमारे पाचन तंत्र को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अलावा ये आंतों से होते हुए शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों जैसे गुर्दे के ऊतकों, लिवर और मस्तिष्क तक पहुंच रहे हैं। द यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको एंड हेल्थ साइंसेज से जुड़े वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह तथ्य सामने आए हैं। इस अध्ययन को जर्नल एनवायर्नमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव्स में प्रकाशित किया गया है। यह पहली बार है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक के कारण इतने घातक परिणाम अध्ययन में उजागर हुए हैं।
जहरीले प्रदूषक और केमिकल मौजूद
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता एलिसेओ कैस्टिलो के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में माइक्रोप्लास्टिक समुद्रों, जानवरों, पौधों और यहां तक की बोतलबंद पानी में पाए गए हैं। इन्हें हर जगह देखा जा सकता है। इनका आकार एक माइक्रोमीटर से पांच मिलीमीटर के बीच होता है। इन महीन कणों में भी जहरीले प्रदूषक और केमिकल मौजूद होते हैं जो स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
चूहों पर किया अध्ययन
अध्ययन से जुड़े कुछ शोधकर्ता निगले गए माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा और उनकी पहचान करने में ध्यान केंद्रित किया, जबकि कैस्टिलो और उनके सहयोगियों ने शरीर के भीतर खासतौर पर पाचन तंत्र और शरीर में पोषक तत्वों को अवशोषित करने के लिए जिम्मेदार अंगों की प्रणाली और आंत की प्रतिरक्षा प्रणाली पर इन कणों के प्रभावों का अध्ययन किया है। यह अध्ययन चूहों पर किया गया था, जिसे चार सप्ताह तक पीने के पानी के माध्यम से माइक्रोप्लास्टिक दिया गया था। इसकी मात्रा इन्सानों के प्रति सप्ताह निगले जा रहे कणों के अनुपात में ही थी।
इतना गहरा असर
अध्ययन में सामने आया कि माइक्रोप्लास्टिक्स ने प्रभावित ऊतकों में चयापचय मार्गों को बदल दिया था। इस संबंध में कैस्टिलो का कहना है कि संपर्क में आने के बाद कुछ ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाया जा सकता है। इससे यह साफ तौर पर ज्ञात होता है कि प्लास्टिक के ये महीन कण आंतों की बाधा को पार कर सकते हैं और अन्य ऊतकों में घुसपैठ कर सकते हैं।
जन्म से लेकर बुढ़ापे तक दंश...
शोधकर्ताओं ने इन्सानी शरीर में जमा होते माइक्रोप्लास्टिक को लेकर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि चूहे तो सिर्फ चार सप्ताह के लिए माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आए थे, जबकि इन्सानों को जीवनभर जन्म से लेकर बुढ़ापे तक इसका दंश झेलना पड़ता है। प्रयोगशाला में स्वस्थ जानवरों पर थोड़े समय के लिए इसके संपर्क में आने के बाद परिवर्तन देखे गए थे। अब इन्सानों की कल्पना करें जो लगातार इसके संपर्क में आते हैं।