भारतीय वैज्ञानिक माइक्रोप्लास्टिक को नष्ट करने का रास्ता खोजेंगे। केंद्र सरकार के बायोटेक्नोलॉजी विभाग (डीबीटी) ने देश के अलग-अलग अनुसंधान केंद्रों के साथ मिलकर अध्ययन की योजना बनाई है। इसके लिए निजी अनुसंधान केंद्र और कंपनियों को भी जुड़ने का न्योता दिया गया है।
डीबीटी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि जैविक प्रक्रियाओं के जरिए माइक्रोप्लास्टिक की समस्या से भारत सहित पूरी दुनिया को छुटकारा दिलाया जा सकता है। प्लास्टिक की तरह उसके छोटे टुकड़े भी वर्षों तक नष्ट नहीं होते हैं। इस योजना पर काफी समय से काम चल रहा है। हाल ही में इस प्रोजेक्ट का समय भी बढ़ाया गया। इससे अधिक से अधिक शोधार्थियों के साथ अध्ययन आगे बढ़ाया जा सकेगा।
जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र और कर्नाटक के खेतों में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। महाराष्ट्र के बड़गांव में मिट्टी के अंदर 15 सेंटीमीटर तक माइक्रोप्लास्टिक अधिक मात्रा में मिला है। वहीं कर्नाटक के खानपुर गांव में जमीन के अंदर 30 सेंटीमीटर तक प्रति एक किलोग्राम मिट्टी में आठ टुकड़ों की दर से माइक्रोप्लास्टिक कण मिले हैं।
वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के रॉयल मेलबर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय और चीन के हेनान विश्वविद्यालय ने संयुक्त रूप से अध्ययन किया है। इसमें बताया गया है, माइक्रोप्लास्टिक और उसके साथ घातक रसायन समुद्र में मौजूद मछलियों तक पहुंचते हैं और उनके आहार बनते हैं। ये उन्हें काफी नुकसान पहुंचाते हैं। यहां तक मछलियां मर भी जाती हैं।
क्या है माइक्रोप्लास्टिक
माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं। ये बीते कुछ वर्षों में भारत सहित पूरी दुनिया के लिए नए संकट के रूप में सामने आए हैं। प्लास्टिक के अलावा ये कपड़ों और अन्य वस्तुओं के माइक्रोफाइबर के टूटने पर भी बनते हैं। इनका आकार एक माइक्रोमीटर से पांच मिलीमीटर तक होता है। सामान्य तौर पर कहें तो ये एक तरह से तिल के बीज के लगभग बराबर होते हैं।