पंजाब में चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तगड़ा मुकाबला बताया जा रहा है। अकाली दल अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद में है, तो भाजपा 2027 का लक्ष्य तय कर चुनाव में उतर रही है। किसान संगठन भी राजनीति में हाथ आजमा रहे हैं, मगर उनके लिए 'समय और दिशा' का चयन ठीक नहीं बताया जा रहा। इन सबके बीच 'पंजाब' खड़ा है जहां 'चिट्टा' (सिंथेटिक ड्रग्स) का बोलबाला है, युवाओं में विदेश जाने की होड़ मची है। 'उड़ते पंजाब' की इस कहानी में 'खाकी और खादी' पर खूब सवाल उठ रहे हैं। इनके गठजोड़ पर सभी चुप हैं।
पंजाब में इस समय चेहरे की बात नहीं हो रही, वोटर मुद्दों पर बोलना चाहता है। कोई भी दल, चाहे वह कितने ही बड़े स्टार प्रचारकों को ही क्यों न ले आएं, लेकिन पंजाब के वोटरों को प्रभावित नहीं कर सकता। यहां अब वादों की नहीं, बल्कि बदलाव लाने वाले की जरूरत है। इस दफा बदलाव आने की आहट सुनाई पड़ रही है।
पंजाब को ड्रग्स से मुक्त कराने, खेती किसानी के मुद्दे और अन्य सामाजिक कार्यों में शामिल रहे कीर्ति किसान यूनियन की राज्य कमेटी के सदस्य रमिन्द्र सिंह ने बताया, भाजपा में चाहे पूर्व सेना प्रमुख जनरल जेजे सिंह शामिल हों, या पूर्व क्रिकेटर दिनेश मोंगिया, इनसे बात नहीं बनने वाली। इस बार चेहरे का कोई मोल नहीं है। दरअसल चुनाव का सामान्य करंट भाजपा के पक्ष में नहीं दिख रहा। पार्टी की सोच है कि वह गुरदासपुर, अबोहर, फाजिल्का, होशियारपुर या पठानकोट में अपने कैडर वोटरों के सहारे कुछ कर सकती है। पंजाब की आज जो हालत है, उसके लिए राजनीतिक पार्टियां बराबर जिम्मेदार हैं। राजनीतिक दलों ने झूठे वादे कर पंजाब को दलदल में फंसा दिया। आज इस सीमावर्ती राज्य में सबसे बड़ा खतरा 'नशा' है। पंजाब को अंधेरी गलियों में धकेलने के लिए 'राजनेता, नौकरशाह और तस्कर', इन तीनों का नेटवर्क जिम्मेदार है।
रमिंद्र सिंह के मुताबिक, अधिकांश परिवारों के पास दस एकड़ से कम रकबे की खेती बची है। यह खेती तो कर्जे में ही रहती है। युवा विदेश जा रहे हैं। खेती को लाभ का सौदा बनाना होगा। उद्योग नहीं लग रहे। नतीजा, पंजाब की क्रीम विदेश में जा रही है। ये समाज का ऐसा हिस्सा है, जिस पर निवेश होता है, लेकिन वह भी दूसरे मुल्क में जा रहा है। राजनेता, इस तरफ नहीं सोच रहे। जब सबसे अच्छा दिमाग बाहर चला गया तो बाकी क्या बचेगा। एग्रो इंडस्ट्री की जरूरत है। यह इंडस्ट्री आतंक के दौर में खत्म हो गई थी। ज्यादातर उद्योग धंधे हिमाचल प्रदेश में चले गए। ऐसे में लोगों को रोजगार कैसे मिलेगा। जमीन या उद्योग, जब इन दोनों में कुछ नहीं हो रहा है तो युवाओं को नशा अपने जाल में फंसा लेता है। युवा उदासीन हैं और बेरोजगार हैं।
चिट्टा को लेकर मजीठिया पर आरोप लगते रहे, लेकिन अमरिंदर सिंह ने कुछ नहीं किया। पूर्व डीजीपी शशिकांत की रिपोर्ट धूल फांकने लगी। उनकी रिपोर्ट में वह सब कुछ था, जिसे पंजाब को नशे की तरफ ले जाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसमें खादी और खाकी, दोनों शामिल हैं। रिपोर्ट में ड्रग नेक्सस का भंडाफोड़ किया गया।
इस रिपोर्ट में कथित तौर पर अकाली दल एवं भाजपा के कई नेताओं का नाम बताया गया है। कैप्टन अमरिंदर सरकार को रिपोर्ट दी गई, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। अभी वह रिपोर्ट दबी हुई है। जो लोग भावी सीएम की दौड़ में हैं, उनके लिए यह रिपोर्ट एक चुनौती बनी रहेगी। किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार की हठ को लोग भूले नहीं हैं। पीएम सुरक्षा चूक मामले में रमिंद्र सिंह ने कहा, इस विषय पर लोगों के बीच यह संदेश जा रहा है कि भाजपा का गेम प्लान सफल नहीं हुआ। इस मामले में हिंदुओं और सिखों के बीच दरार डालने की साजिश रची गई। लोगों ने उसे फेल कर दिया। वजह, पंजाब के लोग अब इस तरह का कोई विवाद नहीं चाहते। अगर कोई दल इस विवाद को बढ़ाना चाहेगा तो वह भी नहीं बढ़ेगा। हां, ये तो है कि किसान आंदोलन ने पंजाब के लोगों का उत्साह बढ़ाया है। अब चन्नी, भगवंत या कोई अन्य नेता सीएम की कुर्सी पर बैठता है, तो उसके सामने 'उड़ते पंजाब' का दाग धोना पहली और सबसे बड़ी चुनौती रहेगी।