भारत और चीन के बीच संबंधों को सुधारने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आठ सूत्र सुझाए हैं, जिनमें आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और साझा हितों के प्रति द्विपक्षीय परिपक्वता शामिल है। उन्होंने कहा, पूर्वी लद्दाख में पिछले वर्ष हुई घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
चीनी अध्ययन पर 13वें अखिल भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए जयशंकर ने बृहस्पतिवार को कहा, भारत और चीन के संबंध दोराहे पर हैं और इस समय चुने गए विकल्पों का न केवल दोनों देशों बल्कि पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा, बीते वर्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हुई घटनाओं ने हमारे संबंधों पर वास्तव में अप्रत्याशित दबाव बढ़ा दिया है। पूर्वी लद्दाख गतिरोध के संबंध में उन्होंने कहा, जो समझौते हुए हैं, उनका पूर्णतया पालन किया जाना चाहिए। एलएसी का कड़ाई से पालन और सम्मान जरूरी है।
एलएसी पर यथास्थिति बदलने का एकतरफा प्रयास स्वीकार्य नहीं
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि यथास्थिति को बदलने का कोई भी एकतरफा प्रयास स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, लद्दाख की घटनाओं ने न सिर्फ सैनिकों की संख्या को कम करने की प्रतिबद्धता का अनादर किया, बल्कि शांति भंग करने की इच्छा भी प्रदर्शित की। हमें चीन के रुख में बदलाव और सीमाई इलाकों में बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती पर अब भी कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं मिला है। चीन के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि संबंधों को आगे तभी बढ़ाया जा सकता है जब वे आपसी सम्मान एवं संवेदनशीलता तथा आपसी हित जैसी परिपक्वता पर आधारित हों।
सीमाओं पर शांति की स्थापना ही संबंधों के संपूर्ण विकास का आधार
विदेश मंत्री ने कहा, सीमावर्ती इलाकों में शांति स्थापना चीन के साथ संबंधों के संपूर्ण विकास का आधार है और अगर इसमें कोई व्यवधान आयेगा तो नि:संदेह बाकी संबंधों पर इसका असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, हमारे सामने मुद्दा यह है कि चीन का रुख क्या संकेत देना चाहता है, यह कैसे आगे बढ़ता है और भविष्य के संबंधों के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं।
तीन दशकों के सबकों को रखना होगा ध्यान
जयशंकर ने कहा, अगर संबंधों को स्थिर और प्रगति की दिशा में लेकर जाना है तो नीतियों में पिछले तीन दशकों के दौरान मिले सबकों पर ध्यान देना होगा। विदेश मंत्री ने कहा, सीमा पर स्थिति की अनदेखी कर जीवन सामान्य रूप से चलते रहने की उम्मीद करना वास्तविक नहीं है। गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले कई महीने से भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच गतिरोध की स्थिति है। इस मामले में कई दौर की राजनयिक स्तर और सैन्य स्तर की बातचीत हो चुकी है ।
बहु ध्रुवीय एशिया के लिए दोनों देशों की प्रतिबद्धता जरूरी
जयशंकर ने कहा, एक ओर जहां दोनों देश बहु ध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं जरूरी है कि बहु ध्रुवीय एशिया इनके मुख्य घटक के रूप में हो। इसके लिए दोनों देशों की प्रतिबद्धता जरूरी है। इसके अलावा जयशंकर ने कहा कि हर देश के अपने हित, चिंताएं और प्राथमिकताएं होती हैं लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम दूसरे देशों के इन मुद्दों को लेकर संवेदनशील रहें। यह भाव एकतरफा नहीं हो सकता। आखिर में दो देशों के रिश्ते पारस्परिक होने जरूरी हैं।
एक दूसरे की आकांक्षाओं का करें सम्मान
जयशंकर ने सुझाव दिया कि हर देश की अपनी आकांक्षाएं होती हैं जिनका सम्मान करना बेहद जरूरी है। इन्हें नजरंदाज करना या महत्व नहीं देना गलत है। इसके अलावा मतभेद भी होंगे लेकिन रिश्तों को कायम रखने के लिए इन मतभेदों का कुशल प्रबंधन होना आवश्यक है।
पाकिस्तान पर भी घेरा
जयशंकर ने पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष मदद को लेकर भी चीन का घेराव किया। उन्होंने कहा, 2020 से पहले भी कई ऐसे मौके रहे जहां चीन ने रिश्तों में खटास लाने वाले फैसले किए। इसमें भारत की धरती पर दहशत फैलाने वाले पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का सहयोग करना शामिल है। एक पड़ोसी होने के नाते चीन का यह रवैया दूरियां पैदा करने वाला और दोहरा मापदंड दिखाने वाला है। इसी तरह एनएसजी में भारत की सदस्यता का बीजिंग से विरोध होना और सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व की राह में चीन का रोड़ा अटकाना भी रिश्तों में खटास लाने वाले कदम हैं।