मथुरा के जवाहरबाग की टेंशन में अफसर ट्रांसफर मांगने लगे थे। सियासी प्रेशर ने अफसरों को इस तरह जकड़ लिया था कि वह मथुरा से हटने में ही अपनी भलाई समझने लगे थे। लखनऊ में होने वाली मासिक बैठक में अधिकारियों ने यहां तक कह दिया था कि या तो कब्जा हटवाने को फोर्स दीजिए या फिर उनका तबादला कर दीजिए।
जवाहरबाग पर 14 मार्च 2014 को रामवृक्ष यादव ने सत्याग्रह के नाम पर कब्जा कर लिया था। दो दिन की अनुमति प्रशासन से मिली थी। वह अनुमति भी शासन से आए फोन के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी ने दी। समय सीमा खत्म होने के साथ ही एसपी सिटी सीओ पहुंचे और बाग खाली करने को कहा गया। लेकिन बाग खाली नहीं किया गया।
खैर महीने दो महीने तो यूं ही बीत गए लेकिन फिर तत्कालीन डीएम ने शासन को रिपोर्ट भेजी। उसके बाद दूसरे जिलाधिकारी भी रिपोर्ट भेजते रहे। छह रिपोर्ट शासन में गईं। कहा गया कि यह लोग जवाहरबाग पर कब्जा करना चाहते हैं। क्योंकि संख्या बल ज्यादा है लिहाजा फोर्स उपलब्ध कराई जाए।
शासन में जो हर माह मीटिंग होती है उसमें भी जवाहर बाग का मुद्दा अफसरों ने उठाया। एक वरिष्ठ अधिकारी अनौपचारिक बताचीत में बताया कि प्रमुख सचिव गृह और मुख्य सचिव की मीटिंग में अफसरों ने कह दिया था कि कार्रवाई की इजाजत नहीं है तो उन्हें हटा दिया जाए। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी ने तो यहां तक कह दिया था कि उन्हें जवाहरबाग खाली कराने के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं मिल रहा है। इससे हालात बिगड़ सकते हैं लिहाजा उन्हें या तो कार्रवाई का अधिकार दें या फिर हटा दें।