सवाल- आखिर मास मीडिया किस हद तक ओपिनियन और राजनीतिक विचारों को प्रभावित करता है, अगर इसे रेगुलेट किया जाए?
संजय अभिज्ञान: पहले हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि देश का मास मीडिया हमेशा से रेगुलेट होता रहा है। सवाल यह है कि अब तक किस तरह की मास मीडिया को रेगुलेट किया जाता है। हम सभी जानते हैं कि हमारे भारत में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी), प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) हैं। हमारे यहां और भी कई संस्थान हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर संस्थान सेल्फ रेगुलेटेड हैं। यानी रेगुलेशन पहले से हैं। लेकिन अगर पूछा जाए कि अतिरिक्त रेगुलेशन लाने से ओपिनियन और विचारों प्रभावित होगा, तो हां बिल्कुल होगा।
इससे प्रभाव जरूर पड़ेगा। लेकिन हमें सावधान रहना होगा कि अगर कोई रेगुलेशन ही नहीं रहा। कुछ लोगों को याद होगा कि पिछले हफ्ते 35 यूट्यूब चैनल्स को भारत के आईटी मंत्रालय ने बैन कर दिया था। वे सभी भारत विरोधी एजेंडा चला रही थीं। इसलिए आपके पास कुछ वॉचडॉग्स होने चाहिए। वो भी खुद रेगुलेट होने वाले। सूचना के प्रसारण और न्यूज के लोकतांत्रिकरण में उनकी भूमिका अहम होती है। यह सुनिश्चित करने के लिए वे निष्पक्ष हों, आपको निष्पक्ष रेगुलेशन की जरूरत होगी। इसलिए सेल्फ रेगुलेटरी होने चाहिए।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि रेगुलेशन होना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि कौन से रेगुलेशन होने चाहिए और यह कैसे होने चाहिए। मुझे लगता है कि रेगुलेशन होना चाहिए, लेकिन सेल्फ रेगुलेशन। खासकर न्यू एज मीडिया में क्या खतरे हैं, जिस तरह से वहां सूचना का प्रसार होता है। इसके अलावा सॉफ्टवेयर और कुकीज जो आपकी निजता के साथ छेड़छाड़ करती हैं। उनके लिए कुछ वॉचडॉग एजेंसी का होना जरूरी है। जो यह सुनिश्चित करें कि न्यूज का प्रसार निष्पक्ष और लोकतांत्रिक हो।
नंद गोपाल राजन: संजय सर ने काफी अच्छे से स्पष्ट कर दिया है कि मीडिया कैसे रेगुलेट होता है और कैसे होना चाहिए। मुझे लगता है कि भारत की न्यायपालिका ने रिपोर्टिंग पर कई सारे प्रतिबंध लगाए हैं कि आप क्या दिखा सकते हैं और क्या नहीं दिखा सकते। इसलिए हम पहले ही ऐसे माहौल में काम कर रहे हैं जहां कई सारे रेगुलेशन हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। जब भी हम कोई स्टोरी लिखते हैं तो हमें इस बारे में सोचना पड़ता है।
जैसे हम कभी भी यौन उत्पीड़न पर कोई न्यूज तैयार करते हैं तो हमें कई सारी गाइडलाइंस माननी पड़ती हैं। जैसे हमें पीड़िता का नाम नहीं उजागर करना, हमें उससे जुड़ी किसी भी चीज की पहचान नहीं जाहिर करनी होती। यहां तक कि कभी-कभी हम गांव तक का नाम उजागर नहीं करते। इसके अलावा जुवेनाइट जस्टिस ऐक्ट भी है। यानी बीते सालों में विनियमन की पहले ही कई परतें लाद दी हैं। पारंपरिक मीडिया ने किस तरह से काम किया है। कई मीडिया घरानों के पास पहले से ही नियम हैं कि वो क्या करेंगे क्या नहीं। ये सभी नियम इसीलिए हैं, ताकि हम निडर और आजाद पत्रकारिता कर सकें, लेकिन कुछ प्रतिबंधों के साथ। ये सभी के लिए पूरी तरह आजाद तो नहीं हो सकती।
जैसा की संजय सर ने कहा कि मास मीडिया की परिभाषा बदल चुकी है। पहले हमारे पास दो-तीन ही माध्यम होते थे। अब आपके पास यूट्यूब है, सोशल मीडिया है। कोई भी उनमें कुछ भी कह सकता है। उनमें रिकॉर्डिंग की व्यवस्था भी नहीं होती। लेकिन उनसे लोगों के दिमाग में प्रभाव पड़ता है और ऐसी बातें तुरंत गायब भी हो जाती हैं। दूसरी तरफ प्रिंट और ऑनलाइन मीडिया में सबकुछ कहीं न कहीं रहता है। ऑनलाइन मीडिया में जो प्रकाशित हो गया, वो आप डिलीट कर सकते हैं, लेकिन वो कहीं न कहीं इंटरनेट पर मौजूद रहता है। यानी आपका रिकॉर्ड मौजूद रहता है। वहीं, पारंपरिक मीडिया में हम संतुलन के प्रति काफी चौकन्ने रहते हैं। जैसे हमें हर पक्ष को प्रकाशित करना होता, सिर्फ एक साइड की स्टोरी नहीं हो सकती।
कई पत्रकार सिर्फ ट्वीट के जरिए ही काम कर रहे हैं। कई लोगों के सिर्फ यूट्यूब चैनल हैं। उनसे कोई सवाल नहीं पूछ सकता, लेकिन वे सबसे सवाल पूछते हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि पारंपरिक मीडिया के लिए पहले से ही काफी रेगुलेशन हैं। इसलिए किसी भी चीज को रेगुलेट करने का बेहतर तरीका सेल्फ रेगुलेशन ही है।
यह कहना ठीक नहीं होगा कि यह रेगुलेशन सरकार की तरफ से ही आना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र के एक स्तंभ के लिए अगर सरकार ही नियम बनाएगी, वह भी ऐसे स्तंभ के लिए जो सरकार से ही सवाल पूछता है, तो यहां परेशानी खड़ी हो सकती है। मीडिया या प्रेस लोकतंत्र का ही एक स्तंभ है। इसलिए अब अगर आप लोकतंत्र के एक स्तंभ को दूसरे स्तंभ की निगरानी की जिम्मेदारी दे देंगे तो यह समस्या पैदा करेगा, इसलिए मीडिया घरानों को सेल्फ रेगुलेटरी होना चाहिए।
सवाल- आखिर कैसे मास मीडिया नई नीतियों को लागू करने में मददगार हो सकता है, क्या आप अपने अनुभव बता सकते हैं...
संजय अभिज्ञान: पब्लिक स्फियर- वह सभी फोरम जहां राजनीतिक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है और वह भी जहां सूचना को नागरिकों के लिए पेश किया जाता है। यानी मास मीडिया ऐसे ढांचे को सामने रखता है, जो पहले ही सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करे। आप उत्तराखंड का उदाहरण ले लें। यहां जो समस्या है, खासकर दूर-दराज के इलाकों में रहने वालों की- वह सड़क की है। इसलिए अगर कोई बीमार पड़ता है तो उसे सड़क की जगह डोली से ले जाना पड़ता है। इस समस्या का हल है हेली-एंबुलेंस, क्योंकि ऋषिकेश में एम्स है। इसलिए यह सरकार की प्राथमिकता हेली एंबुलेंस होनी चाहिए, लेकिन हमने पाया कि सरकार के लिए यह प्राथमिकता में है ही नहीं। इसलिए क्षेत्र के सबसे बड़े अखबार होने के नाते हमने एक अभियान चलाया कि हर जिले में दो हेली एंबुलेंस होनी चाहिए। हमने मास मीडिया के हर हिस्से का इस्तेमाल किया। इसके बाद उत्तराखंड सरकार को बजट में एक नीति लाने का एलान करना पड़ा कि वे धीरे-धीरे हेली एंबुलेंस लाएंगे। ये एक छोटा उदाहरण है कि मास मीडिया किस तरह से नीति निर्माण को प्रभावित कर सकता है।
एक हालिया उदाहरण किसान आंदोलन का है। जाहिर तौर पर किसान आंदोलन उतना सफल नहीं होता अगर मास मीडिया के इतने प्लेटफॉर्म नहीं होते। इससे किसान समुदाय को काफी फायदा हुआ और एक साल के प्रदर्शन के बाद वे जो चाहते थे, उन्हें मिला। सरकार को कानून वापस लेने पड़े। इसलिए अगर मास मीडिया के इतने प्लेटफॉर्म, इतने निजी चैनल, इतने अखबार नहीं होते तो शायद इतना प्रभाव न होता। इसलिए मास मीडिया स्पष्ट तौर पर सार्वजनिक नीतियों के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। हमारे साथ इंडियन एक्सप्रेस के साथी भी हैं, जिनका काफी प्रभाव पड़ता है।
सवाल- क्या आपको लगता है कि पत्रकारों और एंकरों की ओपिनियन विधानों को प्रभावित करती हैं?
नंदगोपाल राजन: ये थोड़ा अजीब सवाल है। क्या किसी की ओपिनियन किसी को प्रभावित करने वाली होनी चाहिए। दूसरा- आपने एंकर और पत्रकारों के बारे में पूछा। ये दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। तो जो उदाहरण संजय सर ने दिया है कि मीडिया को किस तरह से नीतियों को प्रभावित करना चाहिए, ये एक उत्तम उदाहरण है।
आपके पास कई लोग हो सकते हैं जिनका काफी प्रभाव हो। जैसे कोई पत्रकार हो, जिसने 30-40 साल तक कोई विषय कवर किया हो, जिसके पास अनुभव हो और वह उस सेक्टर की चुनौती जानकारी हो। यानी वे उस सेक्टर के अच्छे जानकार होंगे। इसलिए उनकी ओपिनियन एक जानकारी वाली ओपिनियन होगी। यानी अगर कोई बजट जानने वाला बजट के बारे में ओपिनियन देता है, तो उसकी बात काफी अहम होगी और सुनी जाएगी।
लेकिन अगर किसी पत्रकार के 20 लाख फॉलोअर्स हैं या किसी को ज्यादा प्राइम टाइम मिलता है, यह किसी को गंभीरता से लिए जाने का पैमाना नहीं हो सकता। भारत में पिछले कुछ सालों में पत्रकारों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है न कि उन मुद्दों पर जो ध्यान देने योग्य हैं। इंडियन एक्सप्रेस में हम उस तरह से ट्रेन्ड हुए हैं कि हम कोई स्टोरी नहीं हैं। पत्रकार हमेशा पीछे रहें और उनकी स्टोरी आगे। उन्हें खबर में अपना विचार नहीं देना चाहिए। उनका पहला काम रिपोर्टिंग है। वे क्या देखते हैं। इससे लोगों के दिमाग में विचार बनने चाहिए।
उदाहरण के तौर पर हमें बताना चाहिए कि संसद में आज क्या हुआ और पाठक-दर्शक फैसला करें कि वो इस बारे में क्या सोचते हैं। उनके दिमाग में विचार पैदा करें। यह किसी पत्रकार या एंकर की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। आज के समय में तो कई एंकर पत्रकार भी नहीं हैं। वो कभी शायद ग्राउंड पर भी नहीं उतरे हों। मैं भी हर क्षेत्र में नहीं उतरा हूं। मैंने अलग-अलग क्षेत्र में कुछ साल काम जरूर किया है और मुझे अनुभव है। इसका ये मतलब नहीं है कि मैं जो कहूंगा वो सार्वजनिक नीति में चला जाएगा। जब भी एक्सप्रेस कुछ लिखता है तो कई बार विधानसभा और संसद में वो उठता है, क्योंकि उन्हें मुद्दे की अहमियत समझ में आती है। ये मुद्दे इसलिए नहीं उठते क्योंकि उन्हें किसी खास पत्रकार ने उठाया है।