लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने का केंद्र सरकार का प्रस्ताव अगर हकीकत में तब्दील होता है तो इसका सीधा असर देश की सामाजिक रवायतों, शैक्षणिक परिवेश व आर्थिक ढांचे पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि 21 वर्ष में शादी होने पर बेटियां पढ़ेंगी ओर बढ़ेंगी भी। वह उस मुकाम पर पहुंचकर घर-गृहस्थी अपने हाथ में लेंगी, जहां पहले से ही उनके भविष्य का रास्ता तैयार हुआ रहेगा। इसका एक पहलू और भी है, जिसकी जमीं पर खड़े होकर कानून बनने को तैयार इस प्रस्ताव का विरोध भी हो रहा है। समाज के एक तबके का मानना है कि देश में दूसरी कई सामाजिक चुनौतियां हैं।
60 फीसदी ज्यादा होती है शिशु मृत्युदर
हमारे यहां लड़कियां कम उम्र में मां बनती हैं जिससे कई बार उनकी जान को खतरा भी रहता है और नवजात की मौत की दर भी ज्यादा देखी गई है। बहुत कम लोगों को यह पता होता है कि चिकित्सीय तौर पर वह महिलाएं काफी कमजोर होती हैं जिनका बाल विवाह हुआ होता है और इनमें शिशु मृत्युदर सामान्य महिलाओं की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा होता है। 18 वर्ष तक की आयु में शारीरिक तौर पर वह मां बनने लायक होती है लेकिन भावनात्मक और मानसिक तौर पर वो तैयार है कि नहीं ये सबसे जरूरी है। इसलिए 18 से 21 साल आयु बढ़ाना सही फैसला साबित हो सकता है। - डॉ. प्रेरणा वर्मा, प्रसूति रोग विशेषज्ञ, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज
पीएचडी कर बनी गृहिणी लेकिन फैसला मेरा
चंचल कड़कड़डूमा में रहती हैं। इस वक्त वह 28 साल की हैं। तीन साल पहले शादी तब हुई, जब उन्होंने अपनी उच्च स्तर की शिक्षा पूरी कर ली थी। वह हैं तो गृहणी, लेकिन फैसला उनका अपना था, और सोच-समझकर लिया गया था। चाहतीं तो वह नौकरी भी कर सकती थीं और आगे भी कैरियर बनाने का रास्ता बंद नहीं है। चंचल बताती हैं, मेरी शादी 21 साल के बाद तब हुई, जब मेरा पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा हो गया था। आगे मुझे पीएचडी करनी थी। इसी बीच शादी हो गई। हमने अपने पिता और पति को अपनी इच्छा बताई। दोनों भी इस पर सहमत थे। आज मैं गृहणी हूं, लेकिन यह फैसला मेरा अपना है और सोच-समझकर लिया है। आज इस काबिल हूं कि चाहूं तो कैरियर बना सकती हूं।
जमीनी स्तर पर बदलाव जरूरी
समाज में एक मानसिकता बना दी गई है कि लड़की गौण है। उसके भविष्य के बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। वो शादी के बाद अपना भविष्य बना लेगी। लड़की की उम्र बढ़ने के साथ उसके पूरे परिवार का बस एक ही मकसद होता है और वह है शादी। इसी सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि देश में न सिर्फ न्यूनतम आयु में बदलाव हो बल्कि इस नियम का जमीनी स्तर पर पूरी सख्ती के साथ पालन होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो बेटियां न गौण रहेगी और न ही मौन। बेटियां पढ़ेगी, बढ़ेगीं और स्वस्थ रहते हुए सफलता भी हासिल करेगीं। - सोनल कपूर, प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन, नई दिल्ली