अंग्रेज प्रशासक और विद्वान ग्रियरसन ने 1882 में सलहेस की गाथाओं का पहली बार संकलन और प्रकाशन करवाया। रोचक बात यह है कि सलहेश को राजा माना जाता है, इसलिए उसके स्थान को गहवर या गुहार लगाने का स्थान माना जाता है। फ्रांसिस बुकानन द्वारा उधृत कुछ कथाओं में इसे मोरंग का प्रसिद्ध डाकू कहा गया है। इस दृष्टि से तिरुपति बालाजी से इसकी तुलना की जा सकती है जो साहसी लुटेरों के देवता के रूप में प्रसिद्ध है।
इसकी गाथा में वीर और प्रेमरस का माधुर्य है, जिसका भगतों द्वारा गायन आप मिथिला और नेपाल की तराईयों में अक्सर सुन सकते हैं। इसी तरह मुसहर जाति के लोगों के बीच दीना-भद्री की पूजा होती है। दीना-भद्री की गाथाओं का प्रकाशन भी ग्रियरसन द्वारा 1885 में करवाया गया। मुसहर प्रायः हाल के दिनों तक जनजाति की अवस्था में थे और आखेट एवं खाद्य-संग्रह द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे।
इनकी गाथा जोरावर सिंह नामक आतातायी शासक और सामान्य सामंती शोषण के खिलाफ थी। दीना और भद्री दोनों भाई कटैया वन में शिकार खेलने गए और वहां फोटारा गीदड के धूर्तता से लुल्ही बाघिन के शिकार बन गए। दीना-भद्री की गाथा में दोनों भाई मनुसदेवा (पूजित मृतात्मा ) बन कर आते हैं और फिर संघर्ष करते हैं। मुसहर आज भी अपने इन नायकों के वापस आने की प्रतीक्षा करते हैं। मुसहर अक्सर ऊँची जमीन पर दीना-भद्री का स्थान बनाते हैं और उसे गांजा, दारू, और सूअर की बलि देते हैं। अब सलहेस की तरह ही दीना-भद्री की मूर्तियां भी बनने लगी है। इस तरह लोक सम्प्रदायों में एक विशाल परिवर्तन दिख रहा है।
भारतीय परम्परा में सर्प पूजा का महत्व विश्वप्रसिद्ध है। बिहार के पूर्वी हिस्से में बिसहरा स्थान का वही महत्व है जो पश्चिमी हिस्से में बरहम स्थान का। कहा जाता है कि अपनी पांच बहनों में बिसहरा सबसे छोटी थी लेकिन स्वाभाव से सबसे क्रोधी और खतरनाक। बाद में चलकर मनसा और बिसहरा शैव सम्प्रदाय का अंग बनकर रह गयी, लेकिन लोकधर्म के स्तर पर उसका भारी महत्व बना रहा।
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पश्चिमी बिहार में संपहा बाबा के नाम से इनकी पूजा की जाती है। बघौत बाबा की अवधारणा बहुत ही रोचक है। उत्तर बिहार में बहुत सारे ऐसे लोकदेवता मौजूद हैं जिनको देवता इसीलिए माना जाता है कि उन्होंने बाघ से लडाई की थी। इससे संबंधित कई मिथक जनजातीय समाजों में भी मिलता है, जैसे बाघ द्वारा किसी व्यक्ति का शिकार होने से न केवल मृत व्यक्ति की आत्मा भटकती है बल्कि उस बाघ में भी वह आत्मा प्रवेश कर जाती है।
इससे बाघ को मनुष्य का दिमाग मिल जाता है और बाघ पहले से भी ज्यादा ताकतवर हो जाता है। इसीलिए जंगल में जहां किसी व्यक्ति को बाघ मार देता, वहां पत्थर की ढेरी बना दी जाती थी और हर आने जाने वाला व्यक्ति उस ढेरी पर एक पत्थर चढा देता। स्थानीय बैगा या पुजारी कभी कभी उस ढेरी पर दीपक जला कर मुर्गा, सुअर और दारू चढा देता ताकि उसकी आत्मा संतुष्ट रहें। बघौत बाबा की अवधारणा जनजातीय समाज से जाति आधारित समाज में सांस्कृतिक रूपांतरण का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। यदि आप इस इलाके में प्रचलित केवलसिंह-अमरसिंह, दीना-भद्री, फेकूराम, मनसाराम, लल्लन बाबा, रघुनाथ भुइयां, जीवराम-बुलाकी आदि कई लोक देवताओं को देखें तो पता चलता है कि इनकी कथा बाघ से लडने के दौरान मारे जाने की घटना से जुडी हुई है। एक अर्थ में ऐसे स्मारक अपने मवेशियों की रक्षा करते हुए वीरों की स्मृति में बने दक्षिण भारतीय वीरागल के समरूप हैं।
कारू खिरहर के जीवन चरित से लगता है कि ये अक्सर पिछले 150 सालों के दौरान जीवित रहे कोई ऐतिहासिक व्यक्ति और संत थे। ये शिव और गहिल के उपासक कहे जाते हैं। कहा जाता है कि इन्होंने पूरे इलाके में मवेशियों में फैली महामारी को समाप्त किया। इनके पूरे परिवार का उल्लेख मिलता है और इनकी पूजा भी पूरे परिवार सहित होती है।
जोगी बाबा से संबंधित स्थान समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली के इलाके में कई जगह देखे जा सकते हैं। इनकी मूर्ति ऊंट पर सवारी करते बनाई जाती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इनका सम्प्रदाय पश्चिमी भारत से आया था। इसका संबंध नाथपंथी साधुओं से लगता है जिसका प्रभाव बिहार के एक बडे इलाके पर था।
अमर सिंह - केवल सिंह की पूजा मुख्य रूप से मिथिला के मल्लाह जाति के लोग करते हैं। अमर सिंह की प्रसिद्धि इस बात से थी कि उसने ब्राह्मण कुल की कन्या कमला नदी को बदला चमार के गिरफ्त से बचाया जो हड्डी का बांध बना कर कमला को घेरना और फिर उससे विवाह करना चाहता था।
अमर सिंह को कमला के आशीर्वाद से सिद्धि प्राप्त हुई और वह मल्लाहों के बीच पूजा जाने लगा। इसी बीच केवल सिंह का उदय हुआ जो स्थानीय जमींदार के चंगुल से पांच सौ मल्लाहों को मुक्त कराया और बेगारी प्रथा को चुनौती दी।
लोहार, बढई और कुछ दूसरे कारीगर जातियों में नरसिंह का सम्प्रदाय बहुत प्रचलित है। गैर से देखने पर इसमें दो-तीन धाराओं का मेल दिखाई देता है। बरहम बाबा, वृक्ष पूजा, वैष्णव मत और नरसिंह की परंपरा सभी मिश्रित हैं। यहां भी बलि नहीं होती है।
(प्रदीप कांत चौधरी बिहार के लोक देवी-देवताओं पर शोध कर रहे हैं।)