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Manipur: 'बचपन में जिनके साथ खेले, उन लोगों ने ही हमारे घरों को जला दिया', हिंसा पीड़ितों का छलका दर्द

सार

मणिपुर के लोगों से अमर उजाला से विशेष बातचीत में अपने हालात के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि तीन मई से जिंदगी नरक बन गई है। उन्होंने सवाल भी उठाया कि क्या हम लोग भारत के नहीं हैं? क्या हम किसी और मूल के नागरिक हैं? उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मणिपुर मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।
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Manipur Violence - फोटो : Social Media
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विस्तार
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मेरा घर इंफाल घाटी में है। बचपन से लेकर जवानी तक यहीं बीती है। मैं जिस इलाके में रहता हूं, वहीं कुकी और नगा भी रहते हैं। हमारी उम्र के मैतेई, कुकी और नगा बच्चे बचपन से साथ-साथ खेलकर पले और बढ़े, लेकिन वक्त के बदले हालातों ने न सिर्फ इन पड़ोसियों से रिश्ते खत्म कर दिए, बल्कि दुश्मनी जैसे हालात हो गए। कभी जिन पड़ोसियों के भरोसे हम लोग अपना घर छोड़कर नातेदारों के यहां चले जाते थे। वही लोग अब मौका देखकर हमारे घरों को आग के हवाले कर रहे हैं। हमारे पड़ोसियों ने ही हमारे घर जला दिए। मेरे माता-पिता, भाई-बहन समेत हम सभी लोग अब अपने एक रिश्तेदार के गांव में रह रहे हैं।  मणिपुर की इंफाल घाटी में रहने वाले हाओरोकचम ने अमर उजाला डॉट कॉम को मणिपुर से फोन पर अपना दर्द बयां किया। मणिपुर में ऐसे बहुत से लोगों से बातचीत हुई तो सबने यही बताया कि यहां पर हालात इतने खराब है कि हालात से निपटने में हो रही देरी के पर एक एक मिनट भारी पड़ रहा है।

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हमारे पड़ोसियों ने घर को आग लगा दी
मैतेई समुदाय के हाओरोकचम ने बताया कि 27 अप्रैल को वह इंफाल से वापस अपने गांव गए थे, क्योंकि बिगड़े हालातों के चलते तब से लेकर अब तक इंटरनेट की सेवाएं बदहाल हैं और घरवालों का हाल-चाल नहीं मिल रहा था। हाओरोकचम के मुताबिक, हालात बीते कुछ समय से बिगड़ तो रहे थे, लेकिन इस तरह से आग लगाने वाले हालात होंगे, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। 

उनका कहना है कि 3 मई से जब हालात ज्यादा बिगड़ने लगे तो उनको अपने आसपास रहने वाले कुकी और नगा परिवारों पर भरोसा इसलिए होने लगा क्योंकि बचपन से वह इन लोगों के साथ पले बढ़े और साथ खेले कूदे थे। वह कहते हैं कि उनको पूरा भरोसा था कि बिगड़े हालातों में उनके पड़ोसी ही उनकी मदद करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भरभराती हुई आवाज में वह कहते हैं कि मेरे इन्हीं अपने पड़ोसियों ने बिगड़ते हुए हालात में मेरे घर को आग के हवाले कर दिया। 
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अपनों ने भी मुंह फेरना शुरू कर दिया
हारोओकचम कहते हैं कि उनके पिता पूर्वी इंफाल जिले में एक छोटी सी दुकान चलाते थे। वो कहते हैं कि 3 मई की शाम को जब इंफाल में हालात बिगड़ने शुरू हुए तो वह जल्द ही दुकान बंद करके अपने घर आ गए। कचम मणिपुर की एक यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं। उनके मोहल्ले के कुकी और नगा समुदाय के बचपन के दोस्त भी पढ़ाई करते हैं। 

उन्होंने बताया कि जब हालात बिगड़ने लगे तो वह अपने परिवार के साथ अपने घर में इस आसरे के साथ सुरक्षित महसूस करने लगे कि बाहर भले ही कुकी और नगा समुदाय मैतेई को निशाना बना रहा है, लेकिन आसपास के रहने वाले लोग जिनके साथ उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी, वह तो उनको बचा ही लेंगे। कचम कहते हैं कि यह उनकी जिंदगी की बहुत बड़ी भूल साबित हुई है, क्योंकि यूनाइटेड नगा काउंसिल से जुड़े लोग एक-एक बस्ती में जाकर मैतेई समुदाय से जुड़े लोगों को मार रहे थे और उनके घरों को आग के हवाले कर रहे थे। बढ़ते उपद्रव के दौरान जब उनके घर वालों को लगा कि वह इस दौरान यहां पर सुरक्षित नहीं रहेंगे वो लोग भी अपने परिवार के साथ कुछ जरूरी चीजें आभूषण और नकदी लेकर इंफाल घाटी के अपने रिश्तेदारों के गांव पहुंच गए। कुछ दिनों बाद उनके पड़ोस में रहने वाले उनके जानने वाले कुकी लोगों ने न सिर्फ उनके घर को आग लगाई, बल्कि उस बस्ती के सभी घरों को खाक कर दिया।

ऐसा लग रहा है कि युद्ध हो रहा हो
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे मणिपुर के छात्र खंगेबा पंजोहबम कहते हैं कि वह दिल्ली से 28 अप्रैल को मणिपुर सिर्फ इसीलिए गए थे, क्योंकि वहां पर हालात बिगड़ने जैसी सूचनाएं आ रही थी। वह कहते हैं कि अपने घर में सिर्फ वही अकेले सबसे बड़े हैं, इसलिए हालातों को देखते हुए उन्होंने दिल्ली से वापस मणिपुर ही जाना उचित समझा। 3 मई के बाद जिस तरीके से मणिपुर की सड़कों पर आगजनी और हत्याएं हुईं, उससे न सिर्फ वो बल्कि उनका पूरा परिवार अभी भी सदमे में है। 

खंगेबा कहते हैं कि मणिपुर के हालात को मणिपुर में झेल रहा यहां का आदमी ही समझ सकता है। वो कहते हैं कि सड़कों पर जिस तरीके से कत्लेआम मचा हुआ है, लोगों के घरों को जलाया जा रहा है, ऐसा लग रहा है कि यह लड़ाई अपने देश के एक राज्य के दो समुदायों के बीच में नहीं, बल्कि दो दुश्मन देशों के बीच में हो रही है।  उनका दावा है कि जिस तरीके के हालात मणिपुर में बने हुए हैं ऐसा देश के किसी भी राज्य में नहीं होता है। उनकी नाराजगी भी इसी बात से है कि न राज्य सरकार और न केंद्र सरकार को मणिपुर से कोई लेना-देना है। 

दूध और खाने-पीने की चीजों तक के लिए तरस रहे बच्चे
पंजोहबम कहते हैं कि हालात इस तरीके के हो गए हैं कि मणिपुर में हमारे घर के लोगों को जरूरत की चीजें भी मिलना मुश्किल हो रही है। जिन इलाकों में कर्फ्यू लगा है, वहां पर तो घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है और जहां पर कर्फ्यू नहीं लगा है, वहां पर हालातों के चलते बाहर नहीं निकला जा रहा है। 
उनका कहना है कि मणिपुर के ऐसे हालात उनके घर वालों ने तो जरूर एक बार देखे थे, लेकिन वह पहली बार इस तरीके के दौर से गुजर रहे हैं। केंद्र सरकार को इस मामले में मजबूती के साथ दखल देना होगा। यहां पर अभी इस तरीके के हालात बने हैं, उससे यह बिल्कुल नहीं लग रहा है कि स्थितियां बहुत जल्द सुधरने वाली हैं। 

वो कहते हैं कि उनकी कोशिशें है कि वह अपने घर वालों को यहां से किसी दूसरे राज्य में या दिल्ली लेकर आएं, लेकिन दिल्ली तो दूर अपने घर से निकलना भी उनके लिए मुनासिब नहीं हो रहा है। उनका कहना है कि हम लोगों को राशन-पानी से लेकर रोजमर्रा की चीजों को पाने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है यह बात मैं आपको टेलीफोन पर समझा भी नहीं सकता हूं।

क्या हम लोग किसी दूसरे मुल्क के रहवासी हैं?
दिल्ली में मणिपुर स्टूडेंट वेलफेयर एसोसिएशन से ताल्लुक रखने वाले छात्र देबोन कहते हैं कि जिस तरीके के हालातों में मणिपुर को छोड़ दिया गया है, उसे केंद्र सरकार के लिए नाराजगी तो उठती है। क्या हम लोग भारत के नागरिक नहीं है, जो हमारे राज्य को जलता हुआ छोड़ा जा रहा है। क्या हम लोग किसी दूसरे देश के निवासी हैं। उनका आरोप सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियों और जिम्मेदार लोगों के लिए है। 

वो कहते हैं कि इस पूरे मामले में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे आ कर हमारे जलते हुए राज्य को बचाना होगा। वह कहते हैं कि उनका भरोसा प्रधानमंत्री मोदी की उस अपील में है जो मणिपुर को जलने से और पूरी तरह तबाह होने से बचा सकती है। उनका कहना है कि जलते हुए मणिपुर को बचाने के लिए जल्द से जल्द केंद्र सरकार को उचित प्रयास तो करने ही होंगे। उनका कहना है कि बेकाबू होते हालातों में मणिपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों तक में हालात बिगड़ सकते हैं।

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