द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश और जापानी दोनों सेनाओं के लिए काम करने वाले तांगखुल नागा का मणिपुर के उखरुल जिले में वृद्धावस्था की बीमारियों के कारण निधन हो गया। वह 93 साल के थे और उनके परिवार में पत्नी, बेटा और पांच बेटियां हैं। परिजनों ने रविवार को यह जानकारी दी।
यांग्मासो ए शिशाक जब तेरह साल के थे, तब उन्होंने पहली बार एक धावक के रूप में काम शुरु किया था और ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट तक पत्र पहुंचाए थे। उनके बेटे शाइंगम (60 वर्षीय) ने बताया कि जापानी सेना ने 1944 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) के साथ मिलकर नगालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों को मुक्त कराया था, पिता इसका हिस्सा थे, बाद में उन्हें एक कुली के रूप में नियुक्त किया गया था।
शाइंगम ने कहा, युद्ध की समाप्ति के बाद मेरे पिता को एक बुजुर्ग से आईएनए का झंडा मिला, जिसने इसे कांगखुई गांव में गिरा हुआ पाया था। युद्ध के दौरान इसे पास की एक पहाड़ी पर फहराया जाता था।
उन्होंने कहा, 'बुजुर्ग व्यक्ति ने मेरे पिता से आईएनए के झंडे को सुरक्षित रखने के लिए कहा था। हालांकि, पिछले साल शांगशक गांव में तैनात असम राइफल्स के एक अधिकारी ने उनसे झंडा ले लिया था, लेकिन कई बार याद दिलाने के बावजूद उन्होंने इसे वापस नहीं किया और अब उन्हें किसी अन्य स्थान पर तैनात किया गया है। मेरे पिता का इस सप्ताह की शुरुआत में निधन हो गया और उन्हें आईएनए का झंडा वापस नहीं मिला।'
शांगशक की लड़ाई में 350 सैनिकों की मौत की याद में असम राइफल्स ने 2002 में शिशाक के घर के बगल में एक युद्ध स्मारक का निर्माण किया। उन्होंने कहा, 'स्मारक में जापानी तलवार, हेलमेट सहित अन्य वस्तुओं सहित बड़ी संख्या में द्वितीय विश्व युद्ध की कलाकृतियां हैं। गांव में द्वितीय विश्व युद्ध के समय के बंकर भी हैं।' हर साल मार्च में शांगशक गांव में युद्ध दिवस मनाया जाता है, जिसके दौरान स्थानीय लोगों द्वारा सांस्कृतिक प्रदर्शन किए जाते हैं।