Mangaluru auto rickshaw blast
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इस नेटवर्क में छिपा रहता है 'यूजर'
वित्त प्रेषण के लिए आतंकी, अनियमित चैनल जैसे 'यूज ऑफ कैश कूरियर' का उपयोग करने लगे हैं। वजह, इसकी तेज स्पीड, भरोसा, उपभोक्ता पहचान चेक व ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड की कमी आदि बातें, आतंकी संगठनों को खूब पसंद आ रही हैं। इस तकनीक के जरिए आतंकी संगठन, ट्रांजेक्शन को संबंधित राज्य की एजेंसियों की जांच से छिपा लेते हैं। आतंकी फंडिंग व क्राउड सोर्स आदि के लिए 'डार्क वेब' का प्रयोग किया जाने लगा है। केंद्रीय जांच एजेंसी के एक अधिकारी का कहना, आजकल आतंकी संगठन, डार्क वेब का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे 'टोर' और 'द ओनियन राउटर' कहा जाता है। इस नेटवर्क में 'यूजर' को छिपा रहता है। आतंक, नशा, हथियार और साइबर क्राइम जैसे अपराधों में अब यही तकनीक इस्तेमाल हो रही है।
कौन ले रहा है और कौन दे रहा है, कोई नहीं जानता
मेंगलुरु केस के अलावा कई दूसरे मामलों में भी 'द ओनियन राउटर' की तकनीक इस्तेमाल हो रही है। इसमें जो व्यक्ति आपस में संचार करते हैं, उसे ट्रैक करना आसान नहीं होता। जांच एजेंसियों को यह मालूम नहीं होता कि कौन ले रहा है और कौन दे रहा है। खासतौर पर अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन, मसलन आईएसआईएस से जुड़े लोग डार्क वैब का इस्तेमाल करने लगे हैं। 'प्याज के छिलके' उतारने वाली यह तकनीक, जांच एजेंसियों के लिए एक चुनौती है। डार्क वेब या डार्क नेट, आतंकी गतिविधियों, मनी लॉन्ड्रिंग व ड्रग्स की बुकिंग और सप्लाई का बड़ा जरिया बन चुका है। डार्क वेब का इस्तेमाल करने से इंटरनेट पर असली यूजर सामने नहीं आता। यूजर कहां पर है, उसकी ट्रैकिंग और सर्विलांस, जांच एजेंसियों के लिए यह काम बहुत मुश्किल होता है।