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सुप्रीम कोर्ट: पत्नी की हत्या में उम्रकैद की सजा पाए व्यक्ति को किया बरी, निचली अदालत ने सुनाई थी सजा

Thu, 16 Sep 2021 02:40 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने कहा कि केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर व्यक्ति को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की हत्या में उम्रकैद की सजा पाए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन द्वारा बताई गई परिस्थितियां अपराध में उसके शामिल होने की पुष्टि नहीं करती हैं। 

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जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने कहा कि केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर व्यक्ति को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन द्वारा बताई गई परिस्थितियों से अपीलकर्ता आरोपी के अपराध के संबंध में कोई संभावित निष्कर्ष नहीं निकलता है। पीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में देरी के लिए अभियोजन पक्ष की ओर से कोई स्पष्टीकरण पेश नहीं किया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट 18 नवंबर 2011 को मुहैया हो गई थी, लेकिन एफआईआर काफी देर से 25 अगस्त 2012 को दर्ज की गई।

पीठ ने कहा कि जब कोई मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर टिका होता है और आरोपी साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत अपने ऊपर लगे आरोपों का तार्किक जवाब देने में नाकाम रहता है तो ऐसी विफलता साक्ष्यों की शृंखला की एक अतिरिक्त कड़ी उपलब्ध करा सकती हैं। पीठ ने कहा कि न तो अभियोजन पक्ष के गवाहों ने गवाही दी और न ही कोई अन्य सामग्री पेश की गई जो यह दिखाती हो कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी के बीच संबंध किसी भी तरह से तनावपूर्ण थे। इसके साथ ही याचिकाकर्ता घर में अकेले नहीं रह रहा था जहां यह घटना हुई और रिकॉर्ड के मुताबिक घटना के दिन और समय पर याचिकाकर्ता के माता-पिता भी मौजूद थे।
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परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी दिखाती है, इसके पीछे अन्य कहानी भी हो सकती है
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी यह दिखाती है कि इसके पीछे कोई अन्य कहानी भी हो सकती है जिसकी पूरी तरह अनदेखी नहीं की जा सकती। परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा निर्धारित एक मामले में, यदि अभियोजन द्वारा स्थापित की जाने वाली परिस्थितियों की शृंखला स्थापित नहीं की जाती है, तो अभियुक्त द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत बेगुनाही साबित करने में विफलता बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं है। जब शृंखला पूरी नहीं है तो बचाव पक्ष का झूठ आरोपी को दोषी ठहराने का कोई आधार नहीं है। पीठ ने कहा कि आरोपी नागेंद्र शाह का अपराध साबित नहीं होता है और उन्हें बरी किया जाता है। 

निचली अदालत ने सुनाई थी सजा, पटना हाईकोर्ट ने बरकरार रखी
अभियोजन के मुताबिक, याचिकाकर्ता की पत्नी की मौत जलने से हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मौत का कारण ‘गले के आसपास हाथ और अन्य भोथरी वस्तु से दबाव के कारण दम घुटना था। निचली अदालत ने 2013 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी और पटना हाईकोर्ट ने 2019 में इसे बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी थी।

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