विपक्षी दलों के सबसे बड़े सियासी गठबंधन 'INDIA' में प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर मल्लिकार्जुन खरगे का नाम यूं ही आगे नहीं किया गया। गठबंधन में शामिल नेताओं को इस बात का अंदाजा है कि मल्लिकार्जुन खरगे के नाम के साथ न सिर्फ दक्षिण भारत की सियासत मजबूत होगी उत्तर भारत में जातिगत समीकरणों में भी वह आगे हो सकते हैं।
सियासी जानकारों का कहना है कि गठबंधन भले ही आधिकारिक तौर पर शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री के चेहरे को घोषित न करें लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर कुछ दलों को छोड़ दें तो ज्यादातर की सहमति बनी ही है। इसके पीछे असली वजह खरगे का न सिर्फ दलित चेहरा होना है बल्कि दक्षिण के राज्यों में उनकी मजबूत उपस्थिति भी मानी जा रही है।
सियासी जानकारों का कहना है कि मल्लिकार्जुन खरगे के नाम पर सभी दलों की प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर सहमति हो सकती है। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक एमएम चतुर्वेदी कहते हैं कि सियासी तौर पर मल्लिकार्जुन खरगे का नाम का प्रस्ताव आना ही गठबंधन को सियासी तौर पर मजबूत कर सकता है।
उनका मानना है कि मल्लिकार्जुन खरगे के नाम के साथ विपक्षी दलों का गठबंधन समूह एक तो दलित राजनीति के लिहाज से मजबूत होगा। दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दक्षिण भारत में जिस तरीके से कांग्रेस पार्टी या अन्य स्थानीय घटक दल मजबूत हैं उसमें भी मल्लिकार्जुन खरगे दक्षिण भारत के बड़े चेहरे के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह रही कि गठबंधन की बैठक में मल्लिकार्जुन खरगे के नाम को प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे रखने की चर्चा की गई।
राजनीतिक विश्लेषक एन. सुदर्शन कहते हैं कि हाल के दिनों में हुए विधानसभा के चुनाव के परिणाम इस बात की तस्दीक करते हैं कि दक्षिण भारत में कांग्रेस का जनाधार बढ़ा है। अगर दक्षिण भारत के ही किसी बड़े चेहरे को आगे कर लोकसभा के चुनाव में जाया जाए तो गठबंधन को फायदा हो सकता है। जिसका सियासी नफा सिर्फ दक्षिण भारत में ही नहीं होगा, बल्कि उत्तर भारत में भी उसका असर देखा जा सकता है।
सुदर्शन कहते हैं कि हाल के दिनों मे मल्लिकार्जुन खरगे जिस तरीके से दलित चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट हुए हैं वह कांग्रेस पार्टी के लिए भी बूस्टर डोज जैसा है। उनका तर्क है कि संभवत इन्हीं सियासी समीकरणों को देखते हुए गठबंधन की बैठक में खरगे के नाम को आगे किया गया जो न सिर्फ दक्षिण भारत में क्षेत्रीयता के लिहाज से मजबूत दावेदारी में है बल्कि जातीयता के लिहाज से उत्तर भारत में मजबूत संदेश दे सकते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार बृजेंद्र शुक्ला कहते हैं कि विपक्षी दलों के गठबंधन समूह में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अलावा कोई बहुत बड़ा दलित चेहरा नहीं है। ऐसे में अगर उनके नाम को आगे किया जा रहा है तो निश्चित तौर पर उत्तर भारत में दलितों के वोट बैंक पर भी गठबंधन समूह की बड़ी नजर है। हालांकि, शुक्ला का तर्क है कि दलितों के नेता के तौर पर मायावती का चेहरा भी है लेकिन गठबंधन में उनके न होने से यह फायदा गठबंधन समूह के बड़े दलित चेहरे को मिलना तय माना जा रहा है।
वह कहते हैं कि बीते कुछ दिनों में हुए चुनावों के नतीजे भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि कई दलित चेहरे कुछ पार्टियों से छिटक कर कांग्रेस से जुड़ रहे हैं। हालांकि यह प्रतिशत भले बहुत ज्यादा न हो। लेकिन कांग्रेस और गठबंधन मल्लिकार्जुन खरगे के नाम के साथ उनको अपने साथ जोड़ने की कवायद तो कर ही रहा है।