मिजोरम विधानसभा चुनावों में विकास और शराबबंदी ही सबसे प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभर रहे हैं। विकास का एजंडा तो सत्ता के तमाम दावेदारों में कामन है। फर्क इतना ही है कि सत्तारुढ़ कांग्रेस विकास का ढोल पीटते हुए इसके नाम पर वोट मांग रही है तो प्रमुख विपक्षी दल मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) सरकार में आने के बाद लागू की जाने वाली विकास परियोजनाओं के नाम पर। कांग्रेस ने अबकी नई जमीन इस्तेमाल नीति को भी अपना मुद्दा बनाया है।
उसने एक नया आर्थिक विकास कार्यक्रम भी शुरू किया है जिसके तहत लाभार्थियों को एक-एक लाख रुपए की सहायता दी गई है। कांग्रेस प्रमुख ललथनहवला दावा करते हैं कि पार्टी ने बीते 10 वर्षों में राज्य की तस्वीर बदल दी है। वे कहते हैं कि राज्य में उनकी सरकार के खिलाफ कोई प्रतिष्ठान-विरोधी लहर नहीं है और कांग्रेस पहली बार यहां जीत की हैट्रिक लगाएगी। ललथनहवला भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के विपक्ष के आरोपों को भी मनगढ़ंत करार देते हैं। तीन साल पहले शराबबंदी खत्म करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री कहते हैं कि शराबबंदी की वजह से राज्य में नशीली दवाओं का अवैध कारोबार बढ़ रहा था।
दूसरी ओर, विपक्षी एमएनएफ ने विकास के साथ ही शराबबंदी को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। उसने सत्ता में आने की स्थिति में शराबबंदी दोबारा लागू करने का भरोसा दिया है। एमएनएफ प्रमुख जोरमथांगा का आरोप है कि कांग्रेस ने दस साल के शासनकाल के दौरान मिजोरम को बर्बाद कर दिया है। यहां इस दौरान विकास का कोई काम नहीं हुआ। तमाम नेता अपनी जेबें भरने में जुटे रहे। पार्टी ने सत्ता में आने पर अपनी प्रस्तावित सामाजिक-आर्थिक विकास नीति के तहत हर परिवार को तीन-तीन लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने का भरोसा दिया है।
सात दलों के क्षेत्रीय गठबंधन जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने फसल बीमा मुहैया कराने, किसानों के उत्पाद खरीदने और उनको उनकी उचित कीमत दिलाने का वादा किया है। पूर्वोत्तर को कांग्रेस मुक्त करने के सपने के साथ मैदान में उतरी भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज का भरोसा है। वह सत्ता में आने की स्थिति में मिजोरम में विकास की गति तेज करने और पूरे राज्य की तस्वीर बदलने का दावा कर रही है।