कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंशा शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से ही समर्थन देने की थी। एनसीपी प्रमुख शरद पवार को अक्तूबर महीने में चुनाव का नतीजा आने और गठबंधन की सरकार बनने की सूरत में इसी स्थिति का अंदाजा था। कांग्रेस के सूत्र भी इसी की पुष्टि करते हैं, लेकिन बताते हैं परिस्थिति, महाराष्ट्र कांग्रेस नेताओं की सलाह और शरद पवार की कोशिश ने इस तस्वीर को बदल दिया। कांग्रेस भी शिवसेना-एनसीपी सरकार का हिस्सा बन गई।
इसके पीछे का कारण साफ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल की पार्टी को धर्मनिरपेक्ष, अहिंसा में विश्वास रखने वाली उदार विचारधारा की पार्टी मानती हैं। इसके समानांतर शिवसेना को उसकी अबतक की राजनीतिक यात्रा के आधार पर कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली तथा हिंसा में भरोसा रखने वाले राजनीतिक दल के तौर पर मानती हैं।
कांग्रेस पार्टी के शपथ ग्रहण में शामिल न होने की मुख्य वजह वहां जाने वाले के बाद चैनलों और अखबारों में प्रकाशित होने वाली संभावित तस्वीरें थीं। पार्टी नेताओं का मानना है कि इससे पूरे देश में राजनीति और विचारधारा को लेकर गलत संदेश जाएगा। इसी हिचकिचाहट के चलते कांग्रेस पार्टी ने फिलहाल कोई रिस्क लेना उचित नहीं समझा।
गौरतलब है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी के साथ कर्नाटक सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भी गई थीं। वहां मायावती के साथ और सभी दलों के नेताओं के साथ उनकी तस्वीरों को प्रमुखता मिली थी। दूसरे कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी की धर्म निरपेक्ष विचारधारा से कोई समझौता किए जाने का संदेश नहीं देना चाहतीं। बताते हैं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी पहले भी शिवसेना के साथ चुनाव पूर्व या बाद में गठबंधन की पक्षधर नहीं थे।
बताते हैं भाजपा हिंदुत्व की राजनीति करती है, लेकिन शिवसेना मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ और कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करती है। उत्तर भारतीयों को लेकर भी शिवसेना की विचारधारा से कांग्रेस कभी सहमत नहीं रही। इतना ही नहीं शिवसेना समय-समय पर कांग्रेसी नेताओं, रीतियों-नीतियों पर करारा और कई बार अमर्यादित हमला बोलती रही है। इस तरह से कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि शिवसेना विचारधारा के बिल्कुल विपरीत ध्रुव पर खड़ी है।
शिवसेना विचारधारा के स्तर पर अभी कांग्रेस के गले में अटकी हुई राजनीतिक पार्टी है, क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना का गठन ही कांग्रेस विरोध की राजनीति से हुआ था। शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे पूरे जीवनभर कांग्रेस विरोधी राजनीति करते रहे, लेकिन कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एनसीपी की सलाह को वरीयता देकर शिवसेना के साथ सरकार बनाना कुबूल कर लिया। लेकिन अभी शिवसेना के साथ महाराष्ट्र सरकार की कुछ महीने की यात्रा के बाद यह हिचक दूर होगी।
माना जा रहा है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम और समन्वय समिति के साथ सही तालमेल बनाकर चलने के बाद ही शिवसेना और कांग्रेस पार्टी एक राह पर चल पाएंगी। सूत्र बताते हैं तीनों दलों के गठबंधन की जिम्मेदारी एनसीपी प्रमुख शरद पवार के ऊपर है।
शिवसेना के सांसद संजय राउत ने शरद पवार को शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन का नेता माना है। उद्धव ठाकरे का भरोसा भी शरद पवार पर ही है। एनसीपी प्रमुख ने जिस तरह से महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शिवसेना के आत्मसम्मान में सरकार बनाने की राजनीतिक कुशलता दिखाई है, शिवसेना उसका सम्मान करके चल रही है। करीब-करीब यही स्थिति कांग्रेस पार्टी की भी है। ऐसे में शरद पवार शिवसेना के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर जितनी पकड़ बनाए रखेंगे, उतना ही तीनों दलों की गठबंधन सरकार का भविष्य बना रहेगा।