बाला साहेब ठाकरे के रहते हुए भी उन्हें चाहने वालों के मन में एक सवाल हमेशा उठता रहा था कि उनके बाद उनकी राजनीति का असली वारिस कौन होगा? विकल्प में लोगों के सामने बाला साहेब के सबसे छोटे बेटे उद्धव ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे का नाम था। इस सवाल के जवाब में ज्यादातर लोग राज ठाकरे का नाम लिया करते थे, जो उस समय शिवसेना के छात्र-युवा संगठन 'भारतीय विद्यार्थी सेना' के अध्यक्ष हुआ करते थे।
अपने 'स्टाइल' की वजह से हमेशा सुर्खियों में रहने वाले राज ठाकरे का बोलने का अंदाज और विद्रोही तेवर लोगों को उनके अंदर बाला साहेब की छवि की याद दिलाती थी। इसलिए लोग मानकर चल रहे थे कि राज ठाकरे ही बाला साहेब ठाकरे के बाद शिवसेना की गद्दी संभालेंगे। वहीं, तीन भाइयों (बिंदु माधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे) में सबसे छोटे उद्धव स्वभाव से शांत और चर्चा से अपेक्षाकृत दूर रहते थे। उनकी छवि 'शिवसेना टाइप' की राजनीति से मेल नहीं खाती थी। जाहिर है कि लोग उन्हें इस दौड़ से बाहर मानकर चल रहे थे।
लेकिन शिवसेना और ठाकरे परिवार को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि बाला साहेब ठाकरे उद्धव ठाकरे को ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। इसका इशारा लोगों को उसी समय मिल गया था, जब उन्होंने 1989 में उद्धव ठाकरे को शिवसेना ट्रस्ट का ट्रस्टी बना दिया था। यह पद शिवसेना में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि पार्टी के कोष पर इस ट्रस्टी का ही अधिकार होता है। पार्टी कैसे चलेगी और इसका धन कहां और कैसे खर्च किया जाएगा, इस पर ट्रस्टी की राय बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
वहीं, राज ठाकरे को पार्टी के एक अच्छे कार्यकर्ता तक ही सीमित रखा गया था। पार्टी के जानकार मानते हैं कि बाला साहब का यह इशारा उनके उत्तराधिकारी के चयन के लिए काफी था। इस बात पर अंतिम मुहर तब लगी जब शिवसेना ने 2003 में उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया।
शिवसेना नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने भी कई अवसरों पर माना है कि उद्धव ठाकरे बाला साहेब की राजनीति के असली उत्तराधिकारी हैं। उनके मुताबिक केवल बाला साहेब ठाकरे के पुत्र होने के नाते ऐसा नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि उद्धव ठाकरे ने शिवसेना को 'एक संगठन से राजनीतिक दल' तक का सफर तय कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मनोहर जोशी यह भी मानते हैं कि बाला साहेब ठाकरे एक कुशल संगठनकर्ता थे, लेकिन उद्धव ठाकरे उनसे बेहतर राजनेता हैं।
शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक रहे प्रेम शुक्ला कहते हैं कि बाला साहेब ठाकरे उद्धव के प्रति हमेशा विशेष प्रेम रखते थे। अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रुप में उनके चयन को लेकर उनके मन में कोई संदेह कभी नहीं रहा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि उद्धव ठाकरे की राजनीतिक समझ और शांत व्यवहार शिवसेना को आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा कारगर साबित हो सकती थी। वहीं उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण के साथ बाला साहेब ठाकरे की सोच पर भी मुहर लग ही गई।