बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है, स्वतंत्रता सेनानी पेंशन रोकना न्यायोचित नहीं है। यह टिप्पणी 90 साल की महिला की याचिका पर की। यह महिला स्वतंत्रता सेनानी की विधवा है, उनके पति का 56 साल पहले निधन हो चुका है।
सेनानी की 90 साल की विधवा की याचिका पर महाराष्ट्र सरकार को तीन दिन में पक्ष रखने के निर्देश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी की विधवा की याचिका पर महाराष्ट्र सरकार को तीन दिन में अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। याचिकाकर्ता शालिनी चव्हाण ने स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना 1980 के तहत आवेदन किया है। उनके पति लक्ष्मण चव्हाण को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कारावास की सजा हुई थी।
17 अप्रैल 1944 से 11 अक्तूबर 1944 तक जेल में रहे। 12 मार्च 1965 को उनकी मृत्यु हुई। शालिनी के अनुसार, वे 1966 में जेलर से पति के कारावास का प्रमाणपत्र ले चुकी हैं। इसी आधार पर पेंशन का आवेदन किया है।
सरकार का कहना है, लक्ष्मण के जेल में रहने की पुष्टि करता दस्तावेज उसे नहीं मिला है। आशंका है कि ऐसा साक्ष्य अगर था, तो वह गुम या पुराना होने की वजह से खत्म हो गया। हाईकोर्ट ने कहा, साक्ष्यों से लक्ष्मण के स्वतंत्रता सेनानी और शालिनी के उनकी पत्नी होने में कोई विवाद नजर नहीं आता। अगर ऐसा है तो इतने समय तक पेंशन रोकना उचित नहीं है।
बेटे की भी मौत हो चुकी, दर-दर भटक रही विधवा
पति के अलावा शालिनी के बेटे की भी मौत हो चुकी है। 90 वर्ष की उम्र में उनके पास आजीविका का साधन नहीं है। उन्हाेंने 1993 व2002 में पेंशन के आवेदन किए थे। हाईपावर्ड कमेटी के उनका दावा मान लेने के बाद भी पेंशन शुरू नहीं हुई।